Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यथानुभव मे वैतद्यथास्थितमुदाहृतम् ।
आबालसिद्धसंसिद्धं न नाम वरशापवत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या वरदान की नाई या शाप की नाई आपके वचन से ही मेरा माँसमय शरीर आपके शरीर
से सम्बन्ध को प्राप्त होगा ? इस शंका पर श्रीदेवीजी नहीं, ऐसा समाधान करती है ।
अत्यन्त अनभिज्ञ बालकों से लेकर सिद्ध पुरुषों तक प्रसिद्ध सबके अनुभव से सिद्ध
यथास्थित अर्थ का ही मेने अनुवाद किया है, वर और शाप की नाई किसी अपूर्व अर्थ का
जबरदस्ती प्रतिवादन नहीं किया है