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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

दृश्यासंभवबोधो हि ज्ञानं ज्ञेयं च कथ्यते । तदभ्यासेन निर्वाणमित्यभ्यासो महोदयः ॥ ३१ ॥ भवबहुलनिशानितान्तनिद्रासततविवेकविबोधवारिसेकैः । प्रगलति हिमशीतलैरशेषा शरदि महामिहिकेव चेतसीति ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अभ्यास के हेतुओं का प्रतिपादन कर अब श्रीदेवीजी अभ्यास का फल दिखलाती हुई दो श्लोकों से सर्ग का उपसंहार करती हैं। चरमसाक्षात्काररूप ज्ञान और उसका ज्ञेय ब्रह्म भी दृश्य असंभवबोध (दृश्य का असंभव जिससे या जिसमें होता है, ऐसा बोध) कहा जाता है, उसके अभ्यास से मुक्ति होती है, इस प्रकार के अभ्यास का फल महान्‌ अभ्युदय है