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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verses 24–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम् । एतदेकपरत्वं च तदभ्यासं विदुर्बुधाः ॥ २४ ॥ ये विरक्ता महात्मानो भोगभावनतानवम् । भावयन्त्यभवायान्तर्भव्या भुवि जयन्ति ते ॥ २५ ॥ उदितौदार्यसौन्दर्यवैराग्यरसरञ्जिता । आनन्दस्पन्दिनी येषां मतिस्तेऽभ्यासिनः परे ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वप्रथम देवीजी अभ्यास का स्वरूप बतलाती है। असंदिग्धरूप से अपनी बुद्धि मे जमाने के लिए उसका चिन्तन करना, अन्य ज्ञाता पुरुष की बुद्धि से संवाद करने के लिए उसकी चर्चा करना, परस्पर अज्ञात अंश के ज्ञान के लिए आपस में उसका उपदेश देना, सदा उसीमें मनोयोग देना, इसे विद्रान्‌ लोग ज्ञान का अभ्यास कहते हैं (५६)