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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

मांसदेहो मांसदेहेनैव संश्लेषमेष्यति । नतु चित्तशरीरेण व्यवहारेषु कर्मसु ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

मेरी देह का अवस्थापन किसलिए किया जाय, आपकी देह के संसर्ग से यह भी क्यो नहीं जा सकती 2 इस शंका पर देवीजी कहती है । व्यवहारो मे अथवा गमन आदि कर्मों में मांसनिर्मित देह मांसनिर्मित देह से ही संयोग को प्राप्त हो सकती है, मांस देह चित्तशरीरसे कदापि सम्बन्ध को प्राप्त नहीं हो सकती