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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

येयं तु जीवन्मुक्तानां वासना सा न वासना । शुद्धसत्त्वाभिधानं तत्सत्तासामान्यमुच्यते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि को शंका करे कि जीवन्मुक्तो में भी वासना है ही, क्योकि यदि उनमें वासना न होती, तो उनका भोजन आदि व्यवहार ही नहीं बनता, इस पर कहते है । जीवन्मुक्त पुरुषों की जो वासना है, वह वासना नहीं हे, किन्तु सम्पूर्ण शुद्धवासनाओं के बाध के अवधिभूत अधिष्ठानसत्त्व का ही शुद्धवासना यह नाम हे । जैसे कि "जला हुआ कपड़ा" यह भस्म का ही नाम है, वह सम्पूर्ण वासनाओं में अनुगत (अनुस्यूत) सामान्य सत्ता ही शुद्ध वासनारूप से कही जाती है, यह भाव हे