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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verses 7–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verses 7–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 7- 13

संस्कृत श्लोक

प्रक्षीणवासना निद्रा तुर्यशब्देन कथ्यते । जाग्रत्यपि भवत्येव विदिते परमे पदे ॥ ७ ॥ प्रक्षीणवासना येह जीवतां जीवनस्थितिः । अमुक्तैरपरिज्ञाता सा जीवन्मुक्ततोच्यते ॥ ८ ॥ शुद्धसत्त्वानुपतितं चेतः प्रतनुवासनम् । आतिवाहिकतामेति हिमं तापादिवाम्बुताम् ॥ ९ ॥ आतिवाहिकतां यातं बुद्धं चित्तान्तरैर्मनः । सर्गजन्मान्तरगतैः सिद्धैर्मिलति नेतरत् ॥ १० ॥ यदा तेऽयमहंभावः स्वभ्यासाच्छान्तिमेष्यति । तदोदेष्यति ते स्फारादृश्यान्ता बोधता स्वयम् ॥ ११ ॥ आतिवाहिकताज्ञानं स्थितिमेष्यति शाश्वतीम् । यदा तदा ह्यसंकल्पाँल्लोकान्द्रक्ष्यसि पावनान् ॥ १२ ॥ वासनातानवे तस्मात्कुरु यत्नमनिन्दिते । तस्मिन्प्रौढिमुपायाते जीवन्मुक्ता भविष्यसि ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें वासनाओं का सर्वथा क्षय हो जाता है, ऐसी निद्रा "तुर्य शब्द से कही जाती हे, यहाँ पर निद्रा" पद की विवक्षा नहीं हे, क्योकि जागरणावस्था में भी परम पद २ श्लोकस्थ 'निर्मुक्तवासनाबीजे“ का अर्थ जिसमें वासनारूपी बीज स्पष्ट नहीं है यानी तिरोहित है, ऐसा करना चाहिए न कि जिसमें वासनारूपी बीज उच्छिन्न हो गया है, ऐसा अर्थ करना चाहिए, क्योंकि ऐसा अर्थ करने से सुषुप्ति के अनन्तर पुनः स्वप्न की प्राप्ति नहीं होगी । एेसे ही निर्वासनाबीज का अर्थ भी जिसमें सम्पूर्ण वासनारूपी बीज बाधित है, ऐसा करना चाहिए | का ज्ञान होने पर और ज्ञान से समूल वासनाओं का विनाश होने पर तुर्यावस्था होती हैं । जीवित पुरूषों की वह जीवावस्था जिसमें कि वासनाओं का सर्वथा अभाव रहता है जीवन्मुक्ति कहलाती है, उसे अमुक्त (बद्ध) पुरुष नहीं जान पाते हैं। जैसे सूर्य के ताप से बर्फ जलरूप में परिणत हो जाती है, वैसे ही शुद्ध वासनाओं के अवधि अधिष्ठानभूत सत्त्व में संलग्न यानी समाधि के अभ्यास से चिरकाल तक उसमें स्थित तथा क्षीणवासना वाला मन आतिवाहिकता को (सूक्ष्मता को) प्राप्त होता है। आतिवाहिकता को प्राप्त, व्युत्थानकाल में और व्यवहारकाल में भी आत्मज्ञान सम्पन्न मन अन्यान्यसृष्टियों के और अन्यान्य जन्मों के चित्तो से ओर देव आदि के योग्यशरीरों से एकरूप मे मिल जाता हे, जो मन आतिवाहकता को प्राप्त नहीं हे ओर सदा ज्ञानसम्पन्न नहीं है, वह उनसे नहीं मिलता । खूब अभ्यास करने से जब तुम्हारा यह अहंभाव (अहंकार) शान्त हो जायेगा, तब तुम्हारी स्वाभाविक चिद्रूपता, जो कि दुश्यप्रपंच की चरम अवधिभूत है, उदित हो जायेगी । जब तुम्हारा आतिवाहिकताज्ञान सर्वदा के लिए स्थायी हो जायेगा, तब तुम संकल्प से अदूषित अतएव पवित्र लोकों को देखोगी । भद्रे, इसलिए तुम वासनाओं का जैसे क्षय हो वैसा प्रयत्न करो । जब तुम्हारा वासनाक्षय चरम सीमा को प्राप्त हो जायेगा, तब तुम जीवन्मुक्त हो जाओगी