Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verses 18–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, verses 18–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
उदेष्यन्ती च सैवात्र केनचिन्नोपलक्ष्यते ।
केवलं तु जनैर्देहो म्रियमाणोऽवलोक्यते ॥ १८ ॥
देहस्त्वयं न म्रियते न च जीवति किंच ते ।
के किल स्वप्नसंकल्पभ्रान्तौ मरणजीविते ॥ १९ ॥
जीवितं मरणं चैव संकल्पपुरुषे यथा ।
असत्यमेव भात्येव तस्मिन्पुत्रि शरीरके ॥ २० ॥
लीलोवाच ।
तदेतदुपदिष्टं मे ज्ञानं देवि त्वयाऽमलम् ।
यस्मिञ्श्रुतिगते शान्तिमेति दृश्यविषूचिका ॥ २१ ॥
अत्रोपकुरु मे ब्रूहि कोऽभ्यासः कीदृशोऽथवा ।
स कथं पोषमायाति पुष्टे तस्मिंश्च किं भवेत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो यहीं पर स्थिति देखी जाती है, ऐसी अवस्था में यह कैसे सम्भव हो सकता है कि एक ही
काल में एक ही जीव का आतिवाहिक भाव जीवन हो ओर स्थूलभाव से मरण हो ? ऐसी शंका
कर श्रीदेवीजी इसका समाधान करती हैं।
मरणकाल में इसी देह में उदित होनेवाली उक्त आतिवाहिकता को न तो कोई मरनेवाला
देखता है और न जीवित ही देखता है, क्योंकि “तद् यथा पेशस्कारी पेश सो मात्रामादाया*
(जैसे सुवर्णकार सुवर्ण का टुकड़ा काटकर पहले की रचना से नवीन अच्छी से अच्छी दूसरी
शक्ल बनाता है, वैसे ही परलोक जाने का इच्छुक यह आत्मा भी इस वर्तमान शरीर को नष्ट
कर, अचेतनता को प्राप्तकर पितृलोकगमनोपयोगी, गन्धर्वलोकगमनोपयोगी या देवसम्बन्धी
या प्रजापतिलोक प्रापक अथवा ब्रह्म प्रापक या अन्य भूतों के सम्बन्धी दूसरे नूतन शरीर को
बनाता है) ऐसी श्रुति है। उक्त श्रुति के अनुसार पारलौकिक देहनिर्माण के लिए मर रहे पुरुष
का अपने अज्ञान से कल्पित देहारम्भक भूतों के अंशों से संवलित होकर ही परलोक में गमन
होता है, अतः उन मात्राओं का भी, जो कि उसको नहीं दिखाई देती, आतिवाहिक भावों से
विरोध नहीं है । अज्ञान से कल्पित पंचभूतमात्र का अंश जो अज्ञान शरीर है, उसको ओर लोग
मरता हुआ देखते हें । यह अवास्तविक देह न तो मरती है और न जीती हे । स्वप्न ओर संकल्प
के भ्रम मेँ मरण और जीवन क्या हैँ ? यानी उनमें कुछ भी वास्तविकता नहीं है, वे भ्रममात्र हे ।
इसलिए इस विषय में विरोध है, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए