Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 18
सत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग समाधि में देखी गयी सृष्टि और पहले की सृष्टि दोनों दृश्य होने के कारण समानरूप से मिथ्या हैँ चिन्मात्र ही सत्य हैँ |
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- Verses 1–8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, “अत्यन्त दुःखदाय इस चित्त को इस प्रकार बहला र…
- Verses 9–14लीला ने कहा : हे देवी , उत्तम लोग अनुकम्पनीय (करुणा के पात्र) पुरुष पर क्रुद्ध नहीं होते,…
- Verse 15श्रीदेवीजी ने कहा : हे सुन्दरी, सृष्टि की अकृत्रिमता केसी है और कृत्रिमता कैसी है, यह मुझ…
- Verses 16–17लीला ने कहा : हे देवि, जैसे मैं यहाँ पर बैठी हूँ और आप भी स्थित हैं, इसे मैं अकृत्रिम सृष…
- Verse 18[नि-) दर्पण में प्रतिबिम्बित पर्वत की स्थिति के लिए, दर्पण रूप देश पर्याप्त नहीं है, जितन…
- Verse 19उक्त नियम में लीला ने व्यभिचार की शंका कर कहा । लीला ने कहा : माता, कारण से कार्य सर्वथा…
- Verse 20उपादान कारण की विचित्रता से या सहकारी और निमित्त कारणोकी विलक्षणता से मिड्ठी के ढेले और घ…
- Verse 21तुम्हारे पतिदेव की जो वासनामय सृष्टि है, उसमें तो असाधारण कारण से विलक्षणता की कल्पना की…
- Verse 22यहाँ की भूमि आदि से वहाँ की भूमि आदि की उत्पत्ति हो, ऐसी शंका होने पर कहती है । यदि भूतल…
- Verse 23यहाँ के सहकारी कारणों के न रहने पर भी वहाँ (समाधि में दृष्ट सृष्टि में) जो सामग्रीरूप सहक…
- Verse 24सत्यरूप इस सृष्टि के अनुभव से जनित संस्कार से पैदा हुए पुरोवर्ति विषय रहित स्मृतितुल्य स्…
- Verse 25श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, तब तो पहले जन्म में देखी गई सृष्टि के संस्कार द्वारा तुम्हारे…
- Verse 26उक्त बात पर विचार कर लीला जान गई, अतः देवी के आशय के अनुसार बोली । लीला ने कहा : हे देवी,…
- Verse 27लीला की बात का समर्थन करते हुए देवी ने कहा : पुत्री, तुमने बहुत ठीक कहा है, वह असत् (मिथ…
- Verses 28–29लीला ने कहा : माता, जैसे इस सृष्टि से मेरे पति की भ्रमात्मक अमूर्त सृष्टि हुई, जगत्-भ्रम…
- Verses 30–31यह सृष्टि भी पूर्व सृष्टि के संस्कारों से जन्य भ्रान्तिरूप ही है, यों उक्त अर्थ के उपपादन…
- Verses 32–38समूहरूप मच्छरों से सदा “घूं घूं'-सा शब्द करता रहता है, बादलरूपी गृह-घूम (खरो के धुरे) के…