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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verses 32–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, verses 32–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 32-38

संस्कृत श्लोक

कोणस्थभूतवल्मीकव्याप्तपर्वतलोष्टकः । अनेकपुत्रजरठप्रजेशब्राह्मणास्पदम् ॥ ३२ ॥ जीवौघकोशकाराढ्यो व्योमोर्ध्वतलकालिमा । नभोनिवाससिद्धौघमशकाहितघुंघुमः ॥ ३३ ॥ पयोदगृहधूमोग्रजालावलितकोणकः । वातमार्गमहावंशस्थितवैमानकीटकः ॥ ३४ ॥ सुरासुरादिदुर्बाललीलाकलकलाकुलः । लोकान्तरपुरग्रामभाण्डोपस्करनिर्भरः ॥ ३५ ॥ सरःस्रोतोब्धिसरसीजलोक्षितमहीतलः । पातालभूतलस्वर्गभागभासुरकोटरः ॥ ३६ ॥ तत्र कस्मिंश्चिदेकस्मिन्कोणेष्वम्बरकोटरे । शैललोष्टतलेष्वेको गिरिग्रामकगर्तकः ॥ ३७ ॥ तस्मिन्नदीशैलवनोपगूढे साग्निः सदारः सुतवानरोगः । गोक्षीरवान् राजभयाद्विमुक्तः सर्वातिथिर्धर्मपरो द्विजोऽभूत् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

समूहरूप मच्छरों से सदा “घूं घूं'-सा शब्द करता रहता है, बादलरूपी गृह-घूम (खरो के धुरे) के पटल से जिसका कोना व्याप्त रहता है, जिसमें वायुमार्गरूपी महावंश में स्थित वैमानिक (विमानचारी) देवता आदि कीड़े हैँ, जो सुर असुर आदिरूपी उद्धत बालकों की कीड़े के कोलाहलसे सदा खूब शब्दायमान रहता है, भू आदि लोकों के मध्यवर्ती नगर ओर ग्राम रूपी जल से जिसका भूभाग सिंचित हे ओर पाताल, भूलोक और स्वर्गलोकरूपी प्रकाशमान कोठरियों से युक्त हे । उस संसाररूपी पुराने मन्दिर में आकाशरूपी कमरे के किसी एक कोने में पर्वतरूपी मिट्टी के ढेले के तले एक छोटा सा पर्वतग्राम रूपी गङ्का हे । नदी, पर्वत और वनोँसे घिरे हुए उस ग्राम में स्त्री पुत्रों से युक्त ओर नीरोग अग्निहोत्री ब्राह्मण रहता था । उस धर्मात्मा ब्राह्मण के पास गाय आदि दूध देनेवाले अनेक पशु थे । वह राजभयसे सर्वथा निर्मुक्त था और सम्पूर्ण वर्णाश्रमियों का आतिथ्य सत्कार करता था