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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verses 9–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, verses 9–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 9-14

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । अनुकम्प्यस्य नो देवि भजन्त्युद्वेगमुत्तमाः । त्वयेव किल सर्गादौ स्थापिता स्थितिरुत्तमा ॥ ९ ॥ तदिदं यत्पुरः प्रह्वा पृच्छामि परमेश्वरि । तद्ब्रूहि त्वत्कृतो नूनं सफलो मेऽस्त्वनुग्रहः ॥ १० ॥ अस्यादर्शो जगन्नाम्नः खादप्यधिकनिर्मलः । यस्य योजनकोटीनां कोटयोऽवयवो मनाक् ॥ ११ ॥ निःसंधितवचोज्योतिर्घनो मृदुसुशीतलः । अचेत्यचिदिति ख्यातो नाम्ना निर्भित्तिरग्रतः ॥ १२ ॥ दिक्कालकलनाकाशप्रकाशनियतिक्रमाः । यत्रेमे प्रतिबिम्बन्ति परां परिणतिं गताः ॥ १३ ॥ त्रिजगत्प्रतिबिम्बश्रीर्बहिरन्तश्च संस्थिता । तत्र वै कृत्रिमा का स्यात्कासौ वा स्यादकृत्रिमा ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

लीला ने कहा : हे देवी , उत्तम लोग अनुकम्पनीय (करुणा के पात्र) पुरुष पर क्रुद्ध नहीं होते, आपने ही सृष्टि के आरम्भ में यह उत्तम नियम बनाया है । इसलिए हे परमेश्वरि मैं आपके सन्मुख विनम्र होकर जो यह पूछती हूँ, उसे आप मुझसे कहिये, पहले आपने मेरे ऊपर जो वरदानरूप अनुग्रह किया है, वह सफल हो । इस जगत्‌ नामक प्रपंच का आदर्श (चिदादर्श) आकाशसे भी अधिक निर्मल है, करोड़ों-करोड़ों योजन जिसका एक छोटा सा अवयव है । जिसमें वचन अखण्डितार्थ हैं यानी संसर्गरूप से बोधक नहीं हैं ऐसा चिद्घन, मृदु, सम्पूर्ण ताप का नाश करने के कारण शीतल, आवरणशून्य और सम्पूर्ण व्यवहारों में सर्वप्रथम स्फुरित होने वाला चैत्यभिन्न चित्‌ कहा गया है जिस आत्मादर्श में दिशाएँ, काल, सब कार्यो की उत्पत्ति, उत्पन्न हुए पदार्थो की आकाश में अवकाश प्राप्ति, अवकाश मिलने पर आलोक और नेत्र आदि द्वारा प्रकाश और प्रकाशित पदार्थों के “इससे यह कार्य यों उपपन्न हुआ और यह इस प्रकार व्यवहार के उपयुक्त है" इस प्रकार का नियतिक्रम ये सब देशतः ओर कालतः विस्तृत विकाररूप विलक्षणता को प्राप्त होकर प्रतिबिम्ब की नाई भीतर प्रतीत होते हैं । त्रिजगत्‌-रूप प्रतिबिम्ब बाहर ओर भीतर स्थित है, उन दोनों मेँ से यानी आन्तर ओर बाह्ममें से कौन सृष्टि अकृत्रिम (सत्य) है ओर कौन कृत्रिम (मिथ्या) है ?