Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
कृत्रिमोऽकृत्रिमात्सर्गान्न कदाचन जायते ।
नहि कारणतः कार्यमुदेत्यसदृशं क्वचित् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
[नि-) दर्पण में प्रतिबिम्बित पर्वत की स्थिति के लिए, दर्पण रूप देश पर्याप्त नहीं है, जितने समय
में पर्वत की तादृश रूप-रेखा बनती है, वह काल उसके लिए पर्याप्त नहीं है और उससे आरोहण
अवहोरण आदि व्यवहार भी नहीं होता । वह अपनी स्थिति के लिए अपूर्णं अत्यन्त अल्प देश-काल
व्यवहार की पूर्ति नहीं करता, वैसे ही वह सर्गं भी अपनी स्थिति के लिए अपर्याप्त अत्यन्त अल्प
तुम्हारे पति की जो वासनामय सृष्टि है, उसका कोई कारण है या नहीं 2 यदि उसे अकारण
कहो, तो उसकी उत्पत्ति नहीं होगी । यदि सकारण मानों, तो वह कारण कृत्रिम है या अकृत्रिम ।
कृत्रिम कारण मानो, तो यह सृष्टि उसकी कारण है या अन्य सृष्टि ? अन्य सृष्टि तो कोर्ड
प्रसिद्ध है नहीं, अतः पहला पक्ष ही शेष रहा, ऐसी दशा में कृत्रिम सृष्टि का कारणभूत यह सर्ग
भी कृत्रिम ही ठहरेगा, क्योकि कहीं पर भी भिन्न सत्तावाले कार्य ओर कारण नहीं देखे गये हैं
अतः इन दो सृष्टियोंमें परस्पर विलक्षणता नहीं है, इस आशय से देवीजी ने कहा :
अकृत्रिम सृष्टि कभी उत्पन्न नहीं होती, कहीं पर भी कारण से सर्वथा भिन्न कार्य उत्पन्न
नहीं होता