Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
संपद्यते हि यत्कार्यं कारणैः सहकारिभिः ।
मुख्यकारणवैचित्र्यं किंचित्तत्रावलोक्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उपादान कारण की विचित्रता से या सहकारी और निमित्त कारणोकी विलक्षणता से मिड्ठी
के ढेले और घड़े में विलक्षणता भले ही है, जिस वस्तु का एक ही उपादान और निमित्त कारण
है उसमें दीपक से अन्य दीपक के समान कारण से विलक्षणता नहीं दिखलाई देती। प्रस्तुत दो
सृष्टियाँ भी वैसी हैं, इस आशय से देवी लीला की शंका का समाधान करती हैं ।
श्रीदेवीजी ने कहा : जो कार्य उपादान और सहकारी कारणों से उत्पन्न होता है, उसमें
मृत्तिका, दण्ड, चक्र आदि असाधारण कारणों से कुछ विलक्षणता दिखाई देती है