Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 30,31
संस्कृत श्लोक
अस्ति क्वचिच्चिदाकाशे क्वचित्संसारमण्डपः ।
आकाशकाचदलवत्संस्थानाच्छादिताकृतिः ॥ ३० ॥
मेरुस्तम्भस्थलोकेशपुरन्ध्रीशालभञ्जिकः ।
चतुर्दशापवरकस्त्रिगर्तो भानुदीपकः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सृष्टि भी पूर्व सृष्टि के संस्कारों से जन्य भ्रान्तिरूप ही है, यों उक्त अर्थ के उपपादन
के लिए देवी मण्डपोपाख्यान के आरम्भ की प्रतिज्ञा करती हैं ।
श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, जैसे पूर्व सृष्टि की स्मृति से उत्पन्न केवल भ्रमस्वरूप की
स्वप्नभ्रम-तुल्य यह सृष्टि प्रतीत होती है, वैसे मैं कहती हूँ, सुनो ॥२ ९॥ चिदाकाश में अज्ञान
से आच्छन्न भाग में तत्रापि स्रष्टा के अन्तःकरण के एक कोने में संसाररूपी जीर्ण मन्दिर है,
जो आकाशरूपी काँच के टुकड़े के समान नीले छत्राकार संस्थान से आच्छादित है, जिसमें
मेरूपर्वत रूपी स्तम्भ में लोकपालों की स्त्रियाँ प्रतिमाओं के तुल्य विराजमान हैं, चौदह भुवन
जिसके अन्तर्गृह (कमरे) हैं, जिसके तीनों भुवनों के मध्यभागरूप तीन गड़े हैं, सूर्य जिसका
दीपक है