एक बार एक युवक ने मुझसे पूछा — "अगर सब कुछ माया है और वैराग्य ही सही रास्ता है, तो फिर नौकरी क्यों करूँ? परिवार की ज़िम्मेदारी क्यों उठाऊँ? सब छोड़कर जंगल में बैठ जाऊँ?"

यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है — पर यह बहुत ईमानदार सवाल है। और शास्त्रों ने इसका जवाब बहुत स्पष्टता से दिया है।

वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है। वैराग्य का अर्थ है — संसार में रहते हुए, संसार के लिए काम करते हुए, भीतर से उससे न बँधना। और लोकसंग्रह — यानी समाज के प्रति अपना कर्तव्य — वह भी उतना ही ज़रूरी है। इन दोनों को साथ लेकर चलना ही भारतीय अध्यात्म का मूल है।

शास्त्रों से ज्ञान

१. श्रीमद्भगवद्गीता — निरंतर कर्म करो, पर आसक्ति छोड़ो

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ३, कर्मयोग

अनुवाद सीधा है — "आसक्ति से रहित होकर निरंतर कर्तव्य-कर्म करते रहो। आसक्तिरहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।"

यहाँ भगवान् कह रहे हैं — कर्म बंद मत करो। आसक्ति बंद करो। फर्क समझिए — काम वही रहेगा, पर उसमें "यह मेरा है, यह मुझे मिलना चाहिए" वाला भाव हटाना है। यही वैराग्य है — कर्म का नहीं, फल का।

२. श्रीमद्भगवद्गीता — राजा जनक भी कर्म से ही सिद्ध हुए

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ३, कर्मयोग

राजा जनक — जो विदेहराज थे, पूर्ण ज्ञानी थे — वे भी राज्य चलाते थे। दरबार लगाते थे, न्याय करते थे, कर वसूलते थे। क्योंकि लोकसंग्रह — समाज को थामे रखना — उनका धर्म था।

भगवान् अर्जुन से कह रहे हैं — "तुम भी लोकसंग्रह की दृष्टि से कर्म करो।" यानी यह सोचकर काम करो कि तुम्हारे काम से समाज को क्या मिल रहा है — न कि यह कि तुम्हें क्या मिलेगा।

३. श्रीमद्भगवद्गीता — ज्ञानी भी वैसा ही करे जैसा अज्ञानी करता है — पर भीतर से अलग

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ३, कर्मयोग

यह श्लोक थोड़ा चौंकाने वाला है। भगवान् कह रहे हैं — "जैसे अज्ञानी आसक्ति से काम करते हैं, वैसे ही ज्ञानी भी काम करे — पर बिना आसक्ति के।"

यानी बाहर से दोनों एक जैसे दिखेंगे। दोनों सुबह उठेंगे, काम पर जाएँगे, परिवार की देखभाल करेंगे। फर्क सिर्फ भीतर का होगा — एक बँधा हुआ, एक मुक्त। यही लोकसंग्रह और वैराग्य का संतुलन है।

४. श्री योगवासिष्ठ — "महाकर्ता" वह है जो लोकसंग्रह के लिए काम करे

जो पुरुष राग-द्वेष पैदा करने वाली चेष्टा और सुख-दुःख की प्रयोजक क्रिया के फलाफल की इच्छा से रहित मन से — एकमात्र लोकसंग्रहार्थं आचरण करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग ११५

"महाकर्ता" — यह उपाधि उसे मिलती है जो सबसे ज़्यादा काम करे? नहीं। जो सबसे बड़ा पद पाए? नहीं। जो फल की कामना के बिना, केवल लोकहित के लिए काम करे — वह महाकर्ता है।

यह आज के समय में बहुत प्रासंगिक है। अगर आप अपनी नौकरी इस भाव से करें कि "मैं यह इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह समाज के लिए ज़रूरी है" — न कि "मैं यह इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पैसा चाहिए" — तो वही कर्म वैराग्य बन जाता है।

५. श्री योगवासिष्ठ — राजा जनक का आदर्श — अहंकार छोड़ो, कर्म मत छोड़ो

अहंकारमयी वासना का त्याग कर जो लोकसंग्रहोचित व्यवहार से स्थित रहता है, ध्येय वासना त्यागवाला वह जीवन्मुक्त कहलाता है। पूर्वोक्त ध्येय वासना त्याग करके जीवन्मुक्त महात्मा, सज्जनशिरोमणि जनक आदि लोकसंग्रहोचित व्यवहार से स्थित रहते हैं।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग १६

जनक का नाम दोबारा आया — और यह संयोग नहीं है। शास्त्रों ने बार-बार जनक को उदाहरण बनाया क्योंकि वे गृहस्थ थे, राजा थे, युद्ध लड़ते थे — और फिर भी जीवन्मुक्त थे।

उनका रहस्य क्या था? अहंकार का त्याग। वे राज्य चलाते थे — पर "मैं राजा हूँ" का भाव नहीं था। वे निर्णय लेते थे — पर "मेरा निर्णय सर्वश्रेष्ठ है" का अहंकार नहीं था। यही संतुलन है।

६. श्री योगवासिष्ठ — भीतर अनासक्ति, बाहर कर्तव्य — यही जीवन्मुक्त का जीवन

वर्णाश्रमोचित व्यवहार में लोकसंग्रह के लिए अविरति रहती है, बाह्य पदार्थ में अनासक्ति रहती है और आभ्यंतर सुख का निरंतर भोग रहता है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग १६९

यह श्लोक तीन चीज़ें एक साथ बताता है — बाहर निरंतर कर्म, बाहरी चीज़ों में अनासक्ति, और भीतर सतत आनंद। तीनों एक साथ। यह कोई विरोधाभास नहीं — यह संतुलन की परिपूर्णता है।

जब भीतर शांति हो, तो बाहर का कर्म थकाता नहीं। और जब बाहर का कर्म थकाता नहीं, तो वैराग्य स्वाभाविक आता है — जबरदस्ती नहीं।

७. श्रीमद्भागवत — ऋषभदेव — पूर्ण विरक्त, फिर भी राज्य चलाया

भगवान् ऋषभदेव ने अपने देश अजनाभखंड को कर्मभूमि मानकर लोकसंग्रह के लिये कुछ काल गुरुकुल में वास किया।

श्रीमद्भागवत — पंचम स्कंध, ऋषभदेवजी का राज्यशासन

ऋषभदेव को जैन परंपरा में भी आदर मिलता है और वैदिक परंपरा में भी। वे अवतार थे — पूर्ण विरक्त। फिर भी उन्होंने राज्य किया, गुरुकुल में पढ़े, विवाह किया, संतान को शिक्षा दी।

क्यों? क्योंकि लोकसंग्रह उनका धर्म था। जब तक समाज को उनकी ज़रूरत थी — वे रहे। जब ज़रूरत पूरी हुई — वे निकल गए। यह न आसक्ति थी, न पलायन — यह विवेकपूर्ण कर्म था।

८. स्कंद महापुराण — आत्मसंतुष्ट, अहंकारशून्य — भोग और मोक्ष दोनों

जो सदा आत्मलाभ से ही संतुष्ट, सम्पूर्ण भूतों के सुहृद, अहंकारशून्य, शांत हैं — उन साधु-महात्माओं को मैं भक्तियुक्त चित्त से प्रणाम करता हूँ। इस स्तोत्र का पाठ करने से भोग और मोक्ष को प्राप्त करता है।

स्कंद महापुराण — सेतु-माहात्म्य, अध्याय १९०

"भोग और मोक्ष दोनों" — यह सुनकर आश्चर्य होता है। क्या दोनों एक साथ मिल सकते हैं? शास्त्र कहते हैं — हाँ। जब आत्मसंतोष हो, अहंकार न हो, सबका हित चाहते हो — तो भोग भी बंधन नहीं बनता।

यही लोकसंग्रह और वैराग्य का सबसे ऊँचा रूप है — जहाँ दोनों के बीच कोई द्वंद्व नहीं रहता।

समग्र समझ

गीता, योगवासिष्ठ, भागवत और स्कंद पुराण — चारों एक ही बात कहते हैं। लोकसंग्रह और वैराग्य विरोधी नहीं हैं — वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बाहर से पूरी तरह कर्म में संलग्न, भीतर से पूरी तरह मुक्त — यही आदर्श है।

जनक इसके उदाहरण हैं, ऋषभदेव इसके उदाहरण हैं, पृथु इसके उदाहरण हैं। ये सब गृहस्थ थे, राजा थे — और जीवन्मुक्त भी थे। क्योंकि उन्होंने कर्म नहीं छोड़ा — अहंकार छोड़ा।

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
लोकसंग्रह समाज-हितार्थ कर्म का निष्पादन Acting for the welfare and cohesion of society
वैराग्य आसक्ति व फलाकांक्षा का त्याग Detachment from enjoyments and results
महाकर्ता लोकहित के लिए निष्काम कर्म करने वाला Great doer — one who acts only for society's good
असक्ति निर्लिप्तता, लगाव का अभाव Non-attachment to results
सहज कर्म स्वाभाविक, अनायास कर्तव्य Spontaneous natural action without force
जीवन्मुक्त जीवन में ही मुक्ति पाया हुआ One liberated while still living
अहंकार "मैं" और "मेरा" का भाव Ego-sense, the I-maker

जीवन में उपयोग

एक छोटा सा प्रयोग करें — आज जो भी काम करें, उसके शुरू में एक बार मन में कहें: "यह काम मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह मेरा कर्तव्य है, मेरे परिवार और समाज के लिए है।" और काम खत्म होने पर फल की चिंता भगवान् पर छोड़ दें।

बस यह एक बदलाव — काम वही रहेगा, पर भाव बदल जाएगा। और जब भाव बदलता है, तो थकान कम होती है, चिंता कम होती है, और एक अजीब सी शांति आने लगती है। यही वैराग्य की शुरुआत है — और यही लोकसंग्रह का असली अर्थ भी।

Sources

  • Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 3, Karma Yoga (Shloka 19, 20, 25)
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग १६९
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध / सर्ग ११५
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण / सर्ग १६
  • Shrimad Bhagwat Puran — Pancham Skandh / ऋषभदेवजी का राज्यशासन
  • Shrimad Bhagwat Puran — Chaturth Skandh / महाराज पृथु का उपदेश
  • Skanda Mahapurana — Brahma Khanda, Setu Mahatmya / Chapter 190