जब भी भगवान् शिव का स्मरण होता है, हमारे मन में एक ही छवि उभरती है — कैलाश पर्वत पर ध्यानमग्न, जटाओं में गंगा, मस्तक पर अर्धचन्द्र और हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए भोलेनाथ।
लेकिन क्या भगवान् शिव केवल कैलाश तक ही सीमित हैं? क्या वे केवल एक देवता हैं, या सम्पूर्ण सृष्टि का ही स्वरूप हैं?
शिवमहापुराण के शतरुद्रसंहिता में इस प्रश्न का अत्यंत गूढ़ उत्तर मिलता है। वहाँ भगवान् शिव को अष्टमूर्ति कहा गया है — अर्थात् वे आठ रूपों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। इन आठ स्वरूपों को जान लेने के बाद प्रकृति, जीव-जगत और स्वयं अपने भीतर स्थित चेतना को देखने का हमारा दृष्टिकोण ही बदल जाता है।
अष्टमूर्ति क्या है?
"अष्ट" अर्थात् आठ और "मूर्ति" अर्थात् स्वरूप। शिवमहापुराण के अनुसार भगवान् शिव सम्पूर्ण सृष्टि में आठ प्रमुख स्वरूपों से विद्यमान हैं —
- शर्व — पृथ्वी
- भव — जल
- रुद्र — अग्नि
- उग्र — वायु
- भीम — आकाश
- पशुपति — समस्त जीव
- ईशान — सूर्य
- महादेव — चन्द्र एवं आत्मा
नन्दीश्वर, सनत्कुमार से कहते हैं कि जिस प्रकार एक धागे में असंख्य मोती पिरोए रहते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व भगवान् शिव की अष्टमूर्तियों में स्थित है।
आठ स्वरूपों का विवेचन
१. शर्व — पृथ्वी स्वरूप
भगवान् शिव का पहला स्वरूप शर्व है। यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही भगवान् शिव का शरीर मानी गई है। हम जिस धरती पर चलते हैं, जिस पर पर्वत खड़े हैं, जहाँ वन, नदियाँ और असंख्य जीव निवास करते हैं — वह केवल मिट्टी नहीं, बल्कि भगवान् शिव का दिव्य स्वरूप है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता कहा गया है।
ज़रा सोचिए — पृथ्वी कभी अपने ऊपर चलने वाले पैरों में भेद नहीं करती। राजा हो या रंक, संत हो या पापी — धरती सबको समान रूप से सहारा देती है, सबका बोझ बिना शिकायत उठाती है। यही सहनशीलता, यही निःस्वार्थ आधार बनना, शर्व स्वरूप का वास्तविक सार है। जिस प्रकार एक माँ अपने बच्चों में भेद किए बिना सबका पालन करती है, उसी प्रकार पृथ्वी — शिव का शर्व स्वरूप — समस्त जीवों को बिना किसी शर्त के आश्रय देती है।
इस स्वरूप को समझने के बाद पृथ्वी के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाना चाहिए। जब हम जंगल काटते हैं, पहाड़ों को खोखला करते हैं, या मिट्टी को रसायनों से विषाक्त करते हैं — तो हम किसी निर्जीव वस्तु का दुरुपयोग नहीं कर रहे होते, बल्कि साक्षात् भगवान् शिव के शरीर को क्षति पहुँचा रहे होते हैं। यही कारण है कि सनातन परंपरा में वृक्षारोपण, नदी-संरक्षण और भूमि-पूजन को धार्मिक कर्तव्य माना गया है — ये सब कर्म वस्तुतः शर्व स्वरूप की सेवा हैं।
पृथ्वी का संरक्षण करना, उसका सम्मान करना और उसके संसाधनों का दुरुपयोग न करना — वास्तव में भगवान् शिव के शर्व स्वरूप की पूजा है।
२. भव — जल स्वरूप
दूसरा स्वरूप है भव। जल सम्पूर्ण जीवन का आधार है। वर्षा, नदियाँ, झीलें, समुद्र और प्रत्येक जीव के भीतर प्रवाहित होने वाला जीवन-रस — सब भगवान् शिव के भव स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं। जल केवल प्यास बुझाने का माध्यम नहीं है, यह जीवन का पोषण करता है।
ध्यान दीजिए — जल का कोई स्थायी आकार नहीं होता, फिर भी वह हर पात्र में स्वयं को ढाल लेता है। गोल बर्तन में गोल, चौकोर में चौकोर। यही लचीलापन, यही सर्वत्र समाहित हो जाने की क्षमता, भव स्वरूप की गहराई को दर्शाती है। जिस प्रकार जल ऊँचाई से नीचे की ओर स्वाभाविक रूप से बहता है — बिना किसी अहंकार के, बिना किसी प्रतिरोध के — उसी प्रकार शिव की करुणा भी सबसे पहले उन्हीं की ओर बहती है जो विनम्र और आश्रित हैं। यही कारण है कि शिव को गंगाधर कहा जाता है — वे स्वयं जल को अपनी जटाओं में धारण करते हैं, मानो जीवन की इस शक्ति को संभालने का दायित्व स्वयं निभा रहे हों।
प्राचीन काल से ही नदियों को देवी माना गया है, कुओं और तालाबों की पूजा की जाती रही है — यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि इसी सत्य की स्वीकृति है कि जल में स्वयं शिव विद्यमान हैं। आज जब नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल स्तर गिर रहा है — तो यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि भव स्वरूप के प्रति हमारी उपेक्षा का प्रतिबिंब है।
इसीलिए जल का सम्मान करना, उसे व्यर्थ न बहाना और जल-स्रोतों को स्वच्छ रखना भी शिव की उपासना माना गया है।
३. रुद्र — अग्नि स्वरूप
तीसरा स्वरूप है रुद्र। यह अग्नि का स्वरूप है। अग्नि केवल दहन नहीं करती, वह शुद्धि का भी प्रतीक है। यज्ञ की अग्नि, भोजन पकाने वाली अग्नि, शरीर की जठराग्नि और सूर्य की ऊष्मा — ये सभी रुद्र शक्ति के विभिन्न रूप हैं।
अग्नि की एक विशेषता है — वह जो कुछ भी उसे अर्पित किया जाए, उसे अपने ही स्वरूप में बदल देती है। लकड़ी हो या घी, हवन-सामग्री हो या कोई अशुद्ध वस्तु — अग्नि सबको भस्म कर देती है, और भस्म से पुनः पवित्रता उत्पन्न होती है। यही रुद्र स्वरूप का गहरा रहस्य है — यह केवल विनाश नहीं करता, बल्कि विनाश के माध्यम से नवीनीकरण करता है। जैसे वन में लगी दावाग्नि पुराने, सूखे वृक्षों को जलाकर नई कोंपलों के उगने का मार्ग बनाती है, वैसे ही शिव का रुद्र स्वरूप हमारे भीतर के पुराने, जर्जर विचारों और आदतों को जलाकर नए जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है।
यही कारण है कि शिव को "रुद्र" कहा गया — जो रुलाता भी है और दुःख का नाश भी करता है। तपस्या में, यज्ञ में, और स्वयं जीवन के कठिन क्षणों में जो "जलन" अनुभव होती है, वह वास्तव में रुद्र स्वरूप की ही क्रिया है — जो हमें शुद्ध करने के लिए काम कर रही होती है।
अग्नि परिवर्तन का माध्यम है, इसीलिए शिव के रुद्र स्वरूप को परिवर्तन और शुद्धि दोनों का प्रतीक माना गया है।
४. उग्र — वायु स्वरूप
भगवान् शिव का चौथा स्वरूप उग्र है। यह वायु का स्वरूप है। वायु दिखाई नहीं देती, किन्तु उसके बिना जीवन सम्भव नहीं। प्रत्येक श्वास में, हर वृक्ष की गति में, बादलों के प्रवाह में और समुद्र की लहरों में उग्र स्वरूप कार्य करता है।
वायु की एक विशेषता यह भी है कि वह अदृश्य होकर भी सबसे शक्तिशाली प्रभाव डालती है। तूफान वृक्षों को उखाड़ सकता है, पर वही वायु धीमी होकर एक शिशु को सुलाने वाली शीतल बयार भी बन जाती है। यह द्वैत — प्रचंडता और कोमलता दोनों का एक साथ होना — "उग्र" नाम में स्पष्ट झलकता है। शिव भी ऐसे ही हैं — जब आवश्यक हो तो प्रचंड (जैसे तांडव में), और जब आवश्यक हो तो अत्यंत कोमल (जैसे भक्तों के प्रति करुणा में)।
श्वास पर ध्यान देना — प्राणायाम और योग की समस्त परंपरा — वास्तव में इसी उग्र स्वरूप से जुड़ने का प्रयास है। जब हम गहरी, शांत साँस लेते हैं, तो हम प्रत्यक्ष रूप से शिव के इस स्वरूप का अनुभव कर रहे होते हैं। यही कारण है कि प्राण को शिव का ही स्पर्श कहा गया है — हर श्वास, चाहे हम इसे महसूस करें या न करें, शिव के साथ एक अनवरत संवाद है।
प्राण स्वयं भगवान् शिव का ही स्पर्श हैं — यही उग्र स्वरूप का सार है।
५. भीम — आकाश स्वरूप
पाँचवाँ स्वरूप है भीम। यह आकाश का स्वरूप है। आकाश सबको स्थान देता है — उसमें सूर्य भी है, चन्द्र भी, तारे भी, ग्रह भी — किन्तु वह किसी से बंधा नहीं। उसी प्रकार भगवान् शिव सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त होकर भी किसी सीमा में नहीं बंधते।
आकाश की एक अद्भुत विशेषता है — बादल आते हैं, तूफान उठते हैं, पक्षी उड़ते हैं, विमान गुज़रते हैं — पर आकाश स्वयं इन सबसे अछूता रहता है। न बादल उसे गीला करते हैं, न तूफान उसे हिलाते हैं। यह "साक्षी भाव" — सब कुछ होते देखना, पर स्वयं अप्रभावित रहना — भीम स्वरूप का सबसे गहरा संदेश है। जिस प्रकार आकाश में एक कमरे का आकाश और बाहर के अनंत आकाश में कोई वास्तविक भेद नहीं है, केवल दीवारों की सीमा भ्रम पैदा करती है — उसी प्रकार शिव की व्यापकता में भी कोई वास्तविक विभाजन नहीं है, केवल हमारी सीमित दृष्टि भेद उत्पन्न करती है।
यही कारण है कि ध्यान और साधना में आकाश की उपमा बार-बार आती है — साधक को सिखाया जाता है कि वह अपने मन को आकाश जैसा विशाल और अबाधित बनाए, ताकि विचारों के बादल आएँ-जाएँ, पर वह स्वयं शांत और अविचल रहे। यही भीम स्वरूप का व्यावहारिक अभ्यास है।
उनकी यह अबाधित व्यापकता ही भीम स्वरूप है — जो सर्वत्र है, फिर भी किसी सीमा में नहीं बंधा।
६. पशुपति — समस्त जीवों के स्वामी
अधिकांश लोग पशुपति का अर्थ केवल "पशुओं के स्वामी" समझते हैं, किन्तु शिवमहापुराण इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक बताता है। यहाँ "पशु" का अर्थ प्रत्येक जीव है — जो जन्म लेता है, जीता है, और मृत्यु को प्राप्त होता है, वह पशु है। इस अर्थ में मनुष्य भी पशु है, पशु-पक्षी भी, और सूक्ष्मतम जीवाणु भी।
भगवान् शिव सभी जीवों के स्वामी हैं। समस्त जीव उन्हीं के आश्रित हैं, उनका पालन-पोषण भी भगवान् शिव ही करते हैं। पर सबसे गहरी बात यह है कि "पशु" शब्द स्वयं "पाश" से जुड़ा है — अर्थात् बंधन। जो बंधनों में जकड़ा है, वह पशु है। और ये बंधन क्या हैं? अज्ञान, अहंकार, आसक्ति, भय — यही वे रस्सियाँ हैं जो प्रत्येक जीव को बाँधे रखती हैं। शिव इन्हीं पाशों को काटने वाले हैं, इसीलिए वे पशुपति कहलाते हैं — पशुओं के नहीं, बल्कि पाश में बँधे प्रत्येक जीव के स्वामी और मुक्तिदाता।
यह समझ हमारे व्यवहार को गहराई से प्रभावित करती है। जब हम किसी पशु के साथ क्रूरता करते हैं, या किसी जीव को तुच्छ समझते हैं — तो हम भूल जाते हैं कि वह जीव भी उसी शिव का अंश है, जो पाश से मुक्त होने के मार्ग पर है, जैसे हम स्वयं हैं। इसी कारण सनातन परंपरा में गौ-सेवा, जीव-दया और अहिंसा को इतना महत्व दिया गया है — ये सब पशुपति स्वरूप की ही आराधना के रूप हैं।
अज्ञान, अहंकार तथा बंधनों रूपी पशुपाश को काटने वाले भी वही हैं — इसी कारण उनका यह स्वरूप पशुपति कहलाता है।
७. ईशान — सूर्य स्वरूप
सातवाँ स्वरूप है ईशान। यह सूर्य का स्वरूप है। सूर्य सम्पूर्ण संसार को प्रकाश देता है, अन्न उत्पन्न होता है, ऋतुएँ चलती हैं, जीवन गति प्राप्त करता है। उसी प्रकार भगवान् शिव का ईशान स्वरूप संसार में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
सूर्य की एक अनूठी विशेषता है — वह किसी से कुछ नहीं माँगता, फिर भी निरंतर देता रहता है। न दिन में छुट्टी लेता है, न किसी के प्रति भेदभाव करता है — चोर के आँगन में भी उतनी ही रोशनी देता है जितनी संत के आँगन में। यह निष्काम, निरंतर दान ही ईशान स्वरूप की पहचान है। ज्ञान भी ठीक ऐसा ही है — सच्चा ज्ञान किसी से कुछ नहीं माँगता, वह बस स्वयं को उन सबके सामने प्रकट करता है जो अपने भीतर के अंधकार को दूर करने के लिए तैयार हैं।
जैसे सूर्योदय होते ही रातभर का अंधकार तुरंत मिट जाता है — किसी लंबी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती — वैसे ही जब ज्ञान का उदय होता है, तो वर्षों का संचित अज्ञान भी एक क्षण में मिट सकता है। यही कारण है कि गुरु को अक्सर सूर्य के समान बताया जाता है, और शिव को स्वयं आदि-गुरु — जिनसे समस्त ज्ञान-परंपरा का उद्गम माना जाता है।
जैसे सूर्य बाहरी अंधकार को हटाता है, वैसे ही शिव अपने ईशान स्वरूप से अज्ञान का अंधकार दूर करते हैं।
८. महादेव — चन्द्र एवं आत्मा स्वरूप
आठवाँ और अंतिम स्वरूप है महादेव। शिवमहापुराण चन्द्रमा को महादेव का स्वरूप बताता है — चन्द्रमा की शीतलता, संतुलन और अमृतमयी किरणें जीवन में शांति का संदेश देती हैं।
सूर्य और चन्द्र में एक गहरा अंतर है — सूर्य स्वयं प्रकाशित है, जबकि चन्द्रमा सूर्य के ही प्रकाश को परावर्तित करता है, पर उसे इतनी कोमलता से प्रस्तुत करता है कि आँखें बिना चुँधियाए उसे देख सकें। यही कोमलता, यही शीतल, संतुलित प्रकाश — जीवन में उस संतुलन का प्रतीक है जो न अति उत्तेजना माँगता है, न अति निष्क्रियता। चन्द्रमा घटता-बढ़ता है, फिर भी सम्पूर्ण बना रहता है — ठीक वैसे ही जैसे जीवन में सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव आते-जाते रहते हैं, पर भीतर की शांति अक्षुण्ण रह सकती है।
किन्तु ग्रंथ यहीं नहीं रुकता। वह आगे कहता है कि भगवान् शिव का सबसे व्यापक स्वरूप आत्मा है। वही आत्मा प्रत्येक जीव के भीतर स्थित है, वही साक्षी है, वही परम चेतना है। यह अंतिम स्वरूप बाकी सातों स्वरूपों को एक सूत्र में बाँध देता है — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और समस्त जीव — ये सब बाहरी अभिव्यक्तियाँ हैं, और आत्मा उनका अंतरतम केंद्र है। जिस प्रकार एक ही सूत्र में सारे मोती पिरोए होते हैं, उसी प्रकार आत्म-स्वरूप ही वह धागा है जो शेष सातों स्वरूपों को एकता प्रदान करता है।
अर्थात् अपने भीतर स्थित आत्मा को जानना ही शिव को जानना है — और यही अष्टमूर्ति की सम्पूर्ण यात्रा का चरम बिंदु है।
शिवमहापुराण का वास्तविक संदेश
अष्टमूर्ति का वर्णन केवल भगवान् शिव के आठ नाम बताने के लिए नहीं किया गया। इसका उद्देश्य मनुष्य को यह समझाना है कि प्रकृति ईश्वर से अलग नहीं है, प्रत्येक जीव पूजनीय है, पर्यावरण की रक्षा धार्मिक कर्तव्य भी है, और समस्त सृष्टि एक ही परम चेतना से जुड़ी हुई है।
यदि पृथ्वी शिव हैं, तो उसका दोहन क्यों? यदि जल शिव हैं, तो उसे प्रदूषित क्यों? यदि प्रत्येक जीव शिव का अंश है, तो हिंसा और घृणा क्यों? अष्टमूर्ति का दर्शन हमें केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन जीने की सही दृष्टि प्रदान करता है।
निष्कर्ष
भगवान् शिव को समझना केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। जब हम धरती का सम्मान करते हैं, जल को बचाते हैं, प्रकृति की रक्षा करते हैं, जीवों पर दया करते हैं, और अपने भीतर स्थित आत्मा को पहचानने का प्रयास करते हैं — तभी हम वास्तव में शिव की उपासना करते हैं।
शिवमहापुराण की अष्टमूर्ति हमें यही सिखाती है कि भगवान् शिव किसी एक स्थान पर नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। इसीलिए कहा गया है — "सर्वं शिवमयं जगत्" — अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है।
इसी विषय पर और पढ़ें: आत्मा और परमात्मा का स्वरूप क्या है? तथा मोक्ष कैसे प्राप्त होता है?
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अष्टमूर्ति | भगवान् शिव के आठ स्वरूप — शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान, महादेव |
| शर्व | पृथ्वी स्वरूप |
| भव | जल स्वरूप |
| रुद्र | अग्नि स्वरूप |
| उग्र | वायु स्वरूप |
| भीम | आकाश स्वरूप |
| पशुपति | समस्त जीवों के स्वामी |
| ईशान | सूर्य स्वरूप — ज्ञान का प्रकाश |
| महादेव | चन्द्र एवं आत्मा स्वरूप — परम चेतना |
Sources
- शिवमहापुराण — शतरुद्रसंहिता, द्वितीय अध्याय (भगवान् शिव की अष्टमूर्तियों का वर्णन)
- गीता प्रेस, गोरखपुर संस्करण
