Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 8
सातवाँ सर्ग समाप्त आठवाँ सर्ग इस संसाररूपी वृक्ष का ज्ञान से उच्छेद तथा यह संसार संकल्पमण्डप के सदृश है, इसका वर्णन ।
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- Verses 1–2एवोक्त सारी वृक्ष का पुन: वर्णन करते हैं / भुशुण्डीजी ने कहा : हे विद्याधर, जिसका मूलभाग…
- Verse 3रत्न की परीक्षा की नाई तत्त्वदृष्टि से यह क्या है, इसका अच्छी तरह विचार करके “यह केवल ब्र…
- Verse 4शरीर आदि में अहंभावना करने से संसार का बीज अहंकार रहता है सर्वत्र अहंभाव करने से वह नहीं…
- Verse 5सत् या असद् से जिसकी उत्पत्ति की ही संभावना नहीं है उसकी स्थिति ही कहाँ से हो सकती है,…
- Verse 6यह सार तीनों काल में वस्तुतः हैं ही नहीं; इस पर्वोक्त अर्थ को दढ करने के लिए स्रंकल्पक्यू…
- Verse 7जैसे पाचक अपने पाक शास्त्र का भलीभाँति अभ्यास कर लेने पर उस पाक शास्त्र में वर्णित विधि स…
- Verse 8यह सारा सार स्वप्न एवं इन्द्रजालावि के सद्ृध अज्ञात विति का चमत्कारमात्र हैं, इस चिति से…
- Verse 9यह साद्य प्रप विति का एकमात्र चमत्कार ही है, इसका उपपादन करते है / संकल्प के एकमात्र आविर…
- Verse 10यह सारा ससार संकल्पमात्र कल्पित हैं, इस कथन को दद बनाने के लिए संसार में सकल्फदूतमण्डय के…
- Verse 11यह हजारों मणिमय खम्भों से घिरा है, जिसके अग्रभाग में नीचे मुँह करके पिरोये गये सुमेरु की…
- Verses 12–13जिसके भीतर इधर-उधर निवास कर रहे स्त्री, बालक तथा पुरुषों की क्रीडा के लिए पाताल, स्वर्ग ए…
- Verse 14क्रीड़ा लक्ष्मी के आकारभूत जिस मण्डप के भीतर स्त्रियों के श्रृंगार के लिए कर्णफूल आदि अलं…
- Verse 15छोटे-छोटे बच्चों के निःश्वास से भी उड़ जानेवाले जहाँ पर कुलपर्वत गेंद बनाये गये हैं और शर…
- Verse 16हे विद्याधर, जिस मण्डप में कल्प के अन्तकाल के मेघो ने पंखों के स्थान दखल कर लिये हैँ । जह…
- Verse 17जिस मण्डप के भीतर आकाशरूप चौक में जहाँ संसार के आविर्भाव ओर तिरोभाव प्रतिरूप दाँव लगाये ज…
- Verses 18–19इस तरह संकल्प करनेवाले का संकल्प ही अन्तःकरण में चिरकाल की भावना से जैसे सामने स्थित दृश्…
- Verse 20जो कुछ यहाँ स्फुरित हो रहा है वह सब असत्यरूप ही है । वह प्रतिभास से सत्य प्रतीत हो रहा है…
- Verse 21जैसे सुवर्ण मेँ कटक आदि है वैसे ही जिसने अपने उदरकोटर में संसार को धारण कर रखा है ऐसा यह…
- Verse 22इस तरह इस संसार की उत्पत्ति और नाश तत्त्वज्ञानियों की अपनी इच्छा के अत्यन्त ही अधीन है या…
- Verse 23विवेकज्ञानप्राप्ति से ही वुन्हे मुक्ति अवश्य मिल सकती है, ऐसा में अनुमान करता हूँ. यों यु…