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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

अत्यन्तमेव स्वायत्तो यथेच्छसि तथा कुरु । यश्चान्नपानदानादावनादरमुपेयिवान् । तस्येदं पश्चिमं जन्म न स कर्म समुज्झति ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह इस संसार की उत्पत्ति और नाश तत्त्वज्ञानियों की अपनी इच्छा के अत्यन्त ही अधीन है यानी तत्तवज्ञानियों के अपने एेच्छिक विकल्पों से इसका आविर्भाव तथा अविकल्पों से तिरोभाव होना अत्यन्त ही अपने अधीन है इसलिए हे विद्याधर, जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा ही करो । जो पुरुष अन्न पानादि ऐहिक भोगसामग्रियों में तथा दान, यज्ञ आदि पारलौकिक भोगसामग्नियों में फलों की अनभिसन्धि को प्राप्त हो चुका है यानी जो पुरुष इसलोक तथा परलोक के कर्मफलों की इच्छा से शून्य हो चुका है वह कर्मों का कभी त्याग नहीं करता यानी फलप्राप्ति की इच्छा से शून्य होकर वह कर्म करता ही चलता है । हे विद्याधर, ऐसे उस पुरुष का यह अन्तिम जन्म समझिए