Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कारमात्रं त्वं जगद्विद्धीह नेतरत् ।
नाशासु न बहिर्नान्तरेतत्क्वचन विद्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सारा सार स्वप्न एवं इन्द्रजालावि के सद्ृध अज्ञात विति का चमत्कारमात्र हैं, इस चिति
से बाहर कुछ भी नहीं हैं, यह कहते हैं ।
हे विद्याधर, इस संसार को तुम यहाँ एकमात्र चितिका चमत्कार ही समझिए, उससे भिन्न कुछ
नहीं । यह न तो दिशाओं में है, न बाहर है और न भीतर ही कहीं है