Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
भूतशारपरावर्ते द्यूतेऽक्षाः शशिभानवः ।
व्योमाजिरे जगद्भासपणे गृहनिवासिनाम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस मण्डप के भीतर आकाशरूप चौक में जहाँ संसार के आविर्भाव ओर तिरोभाव
प्रतिरूप दाँव लगाये जा रहे हैं और खेलनेवाले ब्रह्मादि मण्डपस्वामियों के जिस जुएँ में चार
प्रकार के जीवसमुदा्योरूपी शारिफलों (शतरंज के मोहरों) का बार-बार जन्म-मरण आदि के
द्वारा भ्रमण हो रहा है तथा सूर्य, चन्द्र॒ आदि नवग्रह ही जहाँ पाशे है