Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 67
छासठवाँ सर्ग समाप्त सड़सठवाँ सर्ग कौतुक से महाराज वसिष्ठजी का शिला के पास जाना, वहाँ जगत् न देखना और उनके पूछने पर विद्याधरी का अभ्यास की महिमा कहना।
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- Verse 1विद्याधरी ने कहा : हे मुने, यदि आप मेरी बात को असंभव मानते हों, तो स्वयं ही उस सम्पूर्ण श…
- Verse 2भद्र, श्रीरामजी, उस तरह उसके कहने पर मैंने "तथास्तु" कहकर उसकी बात स्वीकार कर ली और आकाशर…
- Verse 3तदन्तर उसके साथ में दूर के शून्यरूप आकाशमार्ग को लाँधकर आकाशमण्डल में स्थित देवता आदि प्र…
- Verse 4कुछ समय बाद इसी आकाश में उस देशादि प्राणियों के संचरण मार्ग को भी पारकर मैं उसके साथ श्वे…
- Verse 5उत्तर दिशा के पूर्वभागपर स्थित चन्द्रसदृश अतिधवल आकाश पीठ से नीचे आकर मैं उसके द्वार उस श…
- Verse 6सुवर्णमयी सुमेरुतटी के सदृश वह बहुत बड़ी ऊँची शुभ्र शिला मैंने चारों ओर से खूब देखी, परन्…
- Verse 7श्रीरामजी जगत् को न देखकर मैंने उस सुन्दरी बाला से पूछा कि यहाँ कहाँ पर वे जगत् हैं, जि…
- Verse 8हे रमणि, यहाँ कहाँ पर समुद्र, आकाश एवं दिशाएँ हैं, कहाँ प्राणियों के जन्म ओर विनाश हो रहे…
- Verse 9कहाँ पर्वतों के शिखरो की श्रेणियाँ हैं, कहाँ बड़े-बड़े लवण-समुद्रों की पंक्तियाँ हैं, कहा…
- Verse 10कहाँ क्रिया, काल और कल्पनाएँ हैं, कहाँ भूतो के (देवता आदि के) निवासस्थान भ्रम हैं, कहाँ व…
- Verse 11कहाँ ऋषि और राजा हैं, कहाँ उनमें मुनि हैं, कहाँ नीति-अनीति की रीति है, कहाँ हेमन्त की रात…
- Verse 12कहाँ पुण्य-पाप की गतियाँ हैं, कहाँ काल की कलाओं का विलास है, कहाँ सुर और असुरों का युद्ध…
- Verse 13श्रीरामजी, ज्योंही मैं इस तरह से उससे प्रश्न कर रहा था त्योंही आश्चर्य से व्याकुल मुझको द…
- Verse 14विद्याधरी ने कहा : भगवन्, मैं भी अब पहले के सदुश अपना सब कुछ इस पत्थर की शिला में नहीं द…
- Verse 15हे मुने, हमको जो उन लोगों का दर्शन हो रहा है, उसमें कारण नित्य का अनुभव ही है, वह नित्य क…
- Verse 16समस्त सुक्ष्मातियूक्ष्म पदार्थों के अवलोकन में समर्थ विशुद्ध मनोरूप देह के विस्मरण से भी…
- Verse 17मेरा भी यहाँ जो जगत था वह प्रायः नष्ट ही हो चुका है, क्योकि यद्यपि उसका भने चिरकाल तक अभ्…
- Verse 18जो जगत् मेरे लिए पहले अत्यन्त विस्पष्ट था, उसको मैं अब दर्पण में प्रतिबिम्ब के सदृश अस्प…
- Verse 19हे नाथ, हम लोगों का परस्पर जो दीर्घकाल तक निरर्थक संभाषण हुआ, उससे उत्पन्न व्यथा से अपना…
- Verse 20भगवन्, जो भी अभ्यासजनित संस्कार शुद्ध चिदाकाश के रस से उद्बुद्ध होकर प्रकट होता है, उसी…
- Verse 21अतएव अभ्यास के बिना पुरुष के श्रवण-मनन निष्फल हैं; यह कहती हैं / भद्र, वह कला न उत्तम शास…
- Verse 22सतत अभ्यास के लिए को असाध्य वस्तु हैं ही नहीं; यह कहती हैं / भगवन्, यह जो आपके साथ संवाद…
- Verse 23अतएव लोकरिक या दैविक थिल्पविद्या आदि फलों की उच्छा कर रहे पुरुषोको युरुणी द्वारा उपदिष्ट…
- Verse 24जब अनादि अनन्त संस्राररुप अनर्थ भी ज्ञान के अभ्यास से नष्ट हो जाता हैं तब ऐसा कोन अनर्थ ब…
- Verse 25अभ्यास में उत्तमता होने पर बालकों में भी ग्रोढता देखी जाती है और अभ्यास के छूट जानेपर बड़…
- Verse 26अभ्यास से धीरे-धीरे अज्ञानी भी ज्ञानी बन जाता है, पर्वत भी चूर्ण हो जाता है, अचेतन बाण भी…
- Verse 27इस तरह मिथ्याभूत जो चारों ओर से प्रौढ़ अज्ञानरूपी महामारी है, वह विचाररूप अभ्यास से ही शा…
- Verse 28मुने, अभ्यास से ही कटु पदार्थ अभीष्ट हो जाता है, अभ्यास से ही किसीको नीम अच्छा लगता है और…
- Verse 29समीप के कारण अभ्यासयोग से ही अबन्धु-बन्धुरूप बन जाता है और दूरी के कारण अनभ्यास से बन्धुओ…
- Verse 30देह में भोतिकता की श्रान्ति भरी स्वाभाविक भौतिकता के अभ्यात्न से ही होती है, यह कहती है ।…
- Verse 31यह आधिभौतिक देह धारणा के अभ्यास की भावना से ही पक्षियों के सदुश आकाश में उड़ने की सिद्धि…
- Verse 32कदाचित् श्लाघारूप थोड़े से अपराध से पुण्य भी विफल बन जाते हैं, माताएँ विफल बन जाती हैं औ…
- Verse 33निरन्तर के अभ्यास से दुःसाध्य पदार्थ सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु मित्र बन जाते हैं तथा औषध क…
- Verse 34अतएव शाख्रीय शुभाभ्यास कदापि नहीं छोड़ना चाहिए, यह कहती हैं / इष्ट वस्तु के विषय में जिसन…
- Verse 35तब क्या शाख्रविहित होने से सरी, पुत्रः धन, सत्कर्माुष्ठान आदि अभिमत वस्तु का परित्याग कभी…
- Verse 36तत्वज्ञानार्थ जो अभ्यास हैं, उसका कभी त्याग नहीं करना चाहिए, क्योकि उसके त्याग से तो देह…
- Verse 37जिससे संसार असार बन जाता है, ऐसे विवेक की सेवा में सदा निरत रहनेवाले जो उत्तम पुरुष आत्मव…
- Verse 38घडा चाहनेवाले पुरुष के लिए दीपक की प्रभाएँ घड़े को प्रकाशित करती है और निर्विघ्न उसे प्रा…
- Verse 39जैसे कल्पवृक्ष की लता, जैसे उत्तम चिन्तामणि अथवा जैसे शरद् ऋतु तत्-तत् अभिमत फल प्रदान…
- Verse 40देहरूपी पृथ्वी पर चिरकालिक आत्मविचाराभ्यासरूपी सूर्य अपनी अभीष्ट वस्तु को (परम प्रेम के व…
- Verse 41जितने प्राणी हैं, उन सबके लिए सदा ही सब वस्तुओं का प्रकाश करनेवाला एक अभ्यासरूपी सूर्य सर…
- Verse 42चौदह भुवनं मेँ स्थित चौदह प्रकार की जो प्राणियों की जातियाँ है, उनमें किसी भी प्राणी की स…
- Verse 43अब अभ्यास का स्वरूप बतलाती है / महाराज, किसी एक (क्रिया) का बार-बार करना ही अभ्यास कहा जा…
- Verse 44दृढ़ अभ्यास शब्द से कहा जानेवाला प्रयत्ननामक जो अपना कर्म है, उसी से सिद्धि मिलती है, दूस…
- Verse 45इन्द्रियों पर विजय पाने में समर्थ वीर पुरुष के लिए अभ्यास रूपी सूर्य के तपते रहने पर भूमि…