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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

यदप्यभिमतं वस्तु स्वभ्यासेन तदर्जनात् । तद्युक्तिपूर्वकं त्याज्यमामृत्योर्जीवितं यथा ओ ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्या शाख्रविहित होने से सरी, पुत्रः धन, सत्कर्माुष्ठान आदि अभिमत वस्तु का परित्याग कभी नहीं करना चाहिए 2 उ प्रश्न का नकारात्यक उत्तर देती है / सत्री, पुत्र आदि जो अभिमत वस्तुएँ है, उनका उपार्जन हजारों यत्नो से किया जाता है । इससे उनका भी परित्याग सहसा नहीं करना चाहिए, किन्तु वैराग्य के अभ्यास द्वारा ऐसे युक्ति से परित्याग करना चाहिए, जैसे योगी मृत्युपर्यन्त अत्यन्त अभीष्ट वस्तु जीवन का युक्तिपूर्वक त्याग करता है