Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
अभ्यासभासोऽभिमतं वस्तु प्रकटयन्त्यलम् ।
प्रापयन्ति च निर्विघ्नं घटं दीपप्रभा यथा ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
घडा चाहनेवाले पुरुष के लिए दीपक की प्रभाएँ घड़े को प्रकाशित करती है और निर्विघ्न उसे
प्राप्त करा देती है । उसमें श्रवण-मनन का अभ्यास असंभावनारूप अन्धकार हटाकर वस्तु
को प्रकाशित कर देता है ओर निदिध्यासन का अभ्यास विपरीत भावनारूप विघ्न का
विनाशकर अभीष्ट वस्तु प्राप्त करा देता है, यह तात्पर्य है