Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
इष्टे वस्तुनि नाभ्यासं यः करोति नराधमः ।
सोऽनिष्टेऽनिष्टमाप्नोति नरकान्नरकान्तरम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्वज्ञानार्थ जो अभ्यास हैं, उसका कभी त्याग नहीं करना चाहिए, क्योकि उसके त्याग से तो
देह आदि में अहभावादिका अभ्यास अवश्य होने लय जायेगा / फिर इसका निवारण असंभव हो
जानेपर आनिर्मोक्ष की आपत्ति हो जायेगी / इस आशय से कहती है /
जो नराधम अपनी इष्ट वस्तु के लिए (मोक्षहेतु तत्त्वज्ञान के लिए) अभ्यास नहीं करता,
वह अनीष्ट में यानी देह आदिमे अहंभावरूप अनर्थ में ही रत रहेगा, इस स्थिति में अपने
अभ्यासस्वभाव से अनिष्ट ही प्राप्त करता रहेगा ओर तदनन्तर एक दुःख से दूसरे दुःख को
प्राप्त होता रहेगा, उससे उसका छुटकारा कभी नहीं होगा