Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अभ्यासभास्वति तपत्यवनौ वने च वीरस्य सिध्यति न यन्न तदस्ति किंचित् ।
अभ्यासतो भुवि भयान्यभयीभवन्ति सर्वासु पर्वतगुहास्वपि निर्जनासु ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्रियों पर विजय पाने में समर्थ वीर पुरुष के लिए अभ्यास रूपी सूर्य के तपते
रहने पर भूमि में, जल में या आकाश में ऐसी कोई इच्छित वस्तु नहीं है, जो सिद्ध नहीं हो
सकती । भूमण्डल पर तथा समस्त निर्जन पर्वत की गुहाओं में अभय हेतु बन जाते हैं यानी
अभ्यासी को उनसे तनिक भी भय नहीं होता । वे अभयरूप बन जाते हैं