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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

इष्टवस्त्वर्थिनां तज्ज्ञसूपदिष्टेन कर्मणा । पौनःपुन्येन करणान्नेतरच्छरणं मुने ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव लोकरिक या दैविक थिल्पविद्या आदि फलों की उच्छा कर रहे पुरुषोको युरुणी द्वारा उपदिष्ट पद्धति से बार-बार किया गया उसका अभ्यास ही शरण हैं, दसा नहीं, यह कहती हैं / हे मुने, अपनी-अपनी मनपसन्द वस्तु चाहने वालों के लिए गुरुओं द्वारा उत्तम रीति से उपदिष्ट कर्म करने की पद्धति से बार-बार जो किया जाता है, उसी से अभीष्ट वस्तु उन्हें मिलती है, दूसरे किसी प्रकार से नहीं -अन्य शरण है नहीं