Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 56
पचपनवाँ सर्ग समाप्त छप्पनवाँ सर्ग चिति ही सब कुछ है ओर सर्वत्र ही सर्वात्मक चिति है, इस निश्चय को दृढ़ बनाने के लिए पाषाणआख्यायिका का वर्णन।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, चिन्मय आकाश में सर्वत्र ओर सदा सब कुछ किसी प्रकार…
- Verse 2ङस अर्थ में युक्ति दिखलाते हैं / भद्र, जहाँ चिति है, वहाँ पर ही जगत् की शोभा है, चाहे पृ…
- Verse 3सबकी चिन्ात्रता स्वप्न में प्रसिद्ध है, इसलिए उसको कष्टान्त बनाकर जाग्रत में भी पदार्थों…
- Verse 4हे श्रीरामजी, इस विषय में प्रथम मुझसे ही दृष्ट एक पाषाणाख्यायिका है, वह सब रसों से पूर्ण…
- Verse 5श्रीरामभद्र, किसी समय की बात है-मैंने ज्ञानयोग्य वस्तु का ज्ञान कर लिया था और मेरा मन भी…
- Verse 6तदनन्तर समाधि में एकनिष्ठा प्राप्त कर धीरे-धीरे दीर्घकाल तक विश्रान्ति पाने के निमित्त मै…
- Verse 7शान्ति की ओर गमन कर रहा किसी देवता के स्थान मेँ स्थित मैं जगत् की विलक्षण भगुर गतियो को…
- Verse 8यह जो लोकों की अवस्था है, वह वस्तुतः नीरस ही है, केवल ऊपर ऊपर से सुन्दर लगती है, इसलिए मै…
- Verse 9लोकस्थिति छुखद नहीं है, इतनी ही बात नहीं है किन्तु असीम दुःखदायी भी है, यह कहते हैं / तीव…
- Verse 10यह क्या दिखाई देता है, कौन देखनेवाला है और मैं ही कौन हूँ अर्थात् ये सब तुच्छ हैं । कोई…
- Verses 11–12श्रीरामचन्द्रजी, यह सब विचारकर अन्त में उसीके कारण समस्त सिद्ध, इन्द्र, देव, दैत्य आदि द्…
- Verse 13मुझे जहाँ समाधि लगानी है; वह उत्तम प्रदेश कौन हो सकता है, क्योकि वह प्रदेश अत्यन्त शून्यर…
- Verse 14पर्वत, शिखर आदि अनेक एकान्त प्रदेथ समाधि के लिए है ही, किर उनमें ही कास क्यों न किया जाय…
- Verse 15बड़े-बड़े पर्वतां के अनेक तरह के बीचवाले प्रदेश तो भील आदि जनों से वेष्टित है और वे सब वि…
- Verse 16अनेक तरह के बड़े-बड़े समारोहों से क्षुब्ध नागरिक जनों से युक्त नगर जैसे समाधि के प्रतिकूल…
- Verse 17पर्वततट, जलतट, लोकपालों के नगर, शिखर, पातालों के कुहर आदि सब अनेकविध प्राणियों से व्याकुल…
- Verse 18पर्वतो की ग॒फ़ाओं का तब सेवन करना चाहिए, इस पर कहते हैं । बड़े-बड़े पर्वतो की गहन छिद्रवा…
- Verse 19तब बड़े-बड़े सरोवर ही, जिनको दक्षिणपथ में सरसी कहते है अपने तट पर समाधि के कारण होगे 2 इस…
- Verse 20तब झरने की भूमि आपके समाधि में उपयोगी होगी, इस पर कहते हैं / भद्र, जिसमें वायु के स्पर्श…
- Verse 21इन सब बातों से निष्कर्ष यह निकला कि आकाश ही सब विक्षेपों के उत्पादक हेठुओं से रहित है, इस…
- Verse 22इसके किसी एक कोने में कल्पना से एक कुटिया का निर्माणकर उसके भीतर वासनारहित तथा वज्र के उद…
- Verse 23उस प्रकार विचारकर तलवार की धार के समान निर्मल आकाश की ओर मैं जब बढा, तब क्या देखता हूँ कि…
- Verse 24कहीं तो सिद्धो का गण घूम रहा है, कहीं पर तो बड़ी-बड़ी भयंकर गर्जना ओं से युक्त मेघमण्डल ह…
- Verse 25कहीं पर सुन्दर नगरों के नगर ही घूम रहे हैं, कहीं पर युद्ध का ही आरम्भ हो गया है, कहीं पर…
- Verse 26कहीं -कहीं पर आसन्न दैत्यनगरों के कारण गन्धर्वयुक्त देवनगर उड़ रहे हैं, कही पर ग्रहमण्डल…
- Verse 27कहीं पर तो आकाश में पक्षियों द्वारा आक्रान्त स्थान है, कहीं पर क्रुद्ध भयंकर झंझावात है,…
- Verse 28कहीं पर अपूर्व चित्रविचित्र भूतो का समूह (पिशाचसंघ) पड़ा है, कहीं पर नगरों के समूह के समू…
- Verse 29कहीं पर तो सूर्य की सन्निधि के कारण दाह से प्राणी मर रहे हैं, कहीं पर तो शिशिर ऋतु की शीत…
- Verse 30कहीं पर भयंकर लम्बे वेताल हैं, कहीं पर गरुड़ों से भयंकर है, कहीं पर प्रलय लिये मेघ बरस रह…
- Verse 31भद्र. यह सब तमाशा देखकर उन भूतगणो को छोड़कर मैं दूरातिदूर एकान्त स्थान में पहुँचा, जो अत्…
- Verse 32श्रीरामजी, उस प्रदेश में अत्यन्त मन्द पवन बह रहा था, स्वप्न में भी भूतगण वहाँ नहीं पहुँच…
- Verse 33राघव, उस शून्य प्रदेश में मैंने अपने सत्य संकल्प से एक कुटी का निर्माण किया, उसकी कोठरि्य…
- Verse 34वह मनोहर तो ऐसी लगती थी मानों पूर्णचन्द्रविम्ब में घुनने छेद बना दिया हो, उसे कलार, कुन्द…
- Verse 35पहले तो भने अपने अन्तःकरण से उसकी समस्त भूतां द्वारा अगम्यता बना ली, फिर सव भूतो की अगम्य…
- Verses 36–37तदनन्तर वहाँ मेने पद्मासन बाँध लिया, मन को शान्त कर लिया ओर उत्तम मौन व्रत धारण किया । फि…
- Verses 38–41छौ वर्गो के काद समाधि से व्युत्थान का कारण बतलाते हैं / भद्र, दीर्घकाल तक मन जिसका स्मरण…
- Verse 42उसके बाद क्या हुआ, उतने बतलाते हैं । जैसे वृक्षों के मद का यानी पल्लव आदि की पुष्टि के हे…
- Verse 43उसके बाद क्या हुआ, यह कहते हैं / तदनन्तर पाँच वृत्तिवाले प्राणवायु से तथा इन्द्रियों से प…