Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
तस्मादाकाशमाशून्यं कस्मिंश्चिद्दूरकोणके ।
अत्र तिष्ठाम्यवष्टभ्य योगयुक्तिमनिन्दिताम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन सब बातों से निष्कर्ष यह निकला कि आकाश ही सब विक्षेपों के उत्पादक हेठुओं से रहित
है, इसलिए वही शरण है, ऐसा कहते हैं /
इसलिए मैंने सोचा कि यह चारों ओर से विक्षेपकारणों से रहित आकाश ही मेरी समाधि के
लिए परम उपयोगी है, इस आकाश के किसी दूरवर्ती कोने में परम विशुद्ध आनन्दित योगयुक्ति का
अवलम्बन कर मैं यहाँ स्थित रहूँ