Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
मां प्राणपूरितमुपागतसंविदंशमभ्यागतं त्वहमिति प्रसूतः पिशाचः ।
इच्छाङ्गनाविवलितोऽथ कुतोऽपि सद्यः प्रोन्नामसन्नमनवायुरिवोग्रवृक्षम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके बाद क्या हुआ, यह कहते हैं /
तदनन्तर पाँच वृत्तिवाले प्राणवायु से तथा इन्द्रियों से पूर्णं अतएव आविर्भूत जीवरूप चिति-
अंश से युक्त देहवाले अभ्यागत मुझको देखकर “त्वम् "अहम्" रूप से प्रसिद्ध अहंकाररूप पिशाच,
इच्छारूपी अपनी पत्नी पिशाची के साथ किसी भी अतर्कित प्रदेश से मेरी सन्निधि में ऐसे शीघ्र आ
धमका, जैसे उग्र शाल्मली आदि वृक्षों की सन्निधि में ऊँचे वृक्षों को नमन करानेवाला प्रचण्ड पवन
आ धमकता है