Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
बद्धपद्मासनः शान्तमनाः परममौनवान् ।
संवत्सरशतान्तेन निर्णीयोत्थानमात्मनः ॥ ३६ ॥
निर्विकल्पसमाधिस्थो निद्रामुद्रामिवागतः ।
समः सौम्यनभःस्वस्थः समुत्कीर्ण इवाम्बरात् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर वहाँ मेने पद्मासन बाँध लिया, मन को शान्त कर
लिया ओर उत्तम मौन व्रत धारण किया । फिर यह निश्चय किया कि मैं एक सौ वर्षो के बाद अपनी
समाधि से उठूँगा । यह निश्चय कर निद्रा की मुद्रा के सदृश निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गया,
उस समय मेरी वृत्ति एक थी, निर्मल आकाश के सदुश मैं अपने स्वरूप में था ओर ऐसा प्रतीत हो
रहा था कि मैं आकाश से ही वेष्टित हो गया हूँ