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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

पवनस्पर्शसंक्षुब्धतृणपांसुपताकिनी । रटत्यनिलभांकारैर्निर्झरोर्व्यप्यसंयता ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

तब झरने की भूमि आपके समाधि में उपयोगी होगी, इस पर कहते हैं / भद्र, जिसमें वायु के स्पर्श से क्षुब्ध हुए तृण और धूलिरूपी पताकाएँ विद्यमान हैं, ऐसा झरने का प्रदेश भी विक्षेप का निवारण नहीं कर सकता, क्योकि वह प्रदेश वायु के भाँकार शब्दों से निरन्तर झाँय-झाँय शब्द का रटन करता रहता है