Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 55
चौवनवाँ सर्ग समाप्त ~ पचपनवाँ सर्ग अन्य की भावना से अपने को अन्यरूप देखती हुई जगत् के रूप में स्थित चिति स्वभावना से तो अनन्यरूप ही है, अतः जगत् वास्तव मे परमार्थमय है, यह वर्णन।
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- Verse 1एवोक्त शक्तियों से जगद् ब्रह्म से जब अत्यन्त अभिन्न है, तब फलित यह हुआ कि उसकी की उत्पति…
- Verse 2उत्पत्तिवाद में तो अवश्य ही बीज बतलाना चाहिए, परन्तु वह बतलाया जा ही नहीं सकता; यों जो बा…
- Verse 3इसीलिए ज्ञानी पुरुष सक जगत् वित्स्वभाव ही हे“ ऐसी भावना करता हुआ स्थित रहता हैं, यह कहते…
- Verse 4स्वरूपप्राप्त कर लेता है
- Verse 5अतएव अनुत्यन्न अन्य वस्तु के स्वभाव का साक्षात्कार हो जाने पर उती के रूप में स्थिति होती…
- Verse 6तब उम्नीने यह जयत् उत्पन्न किया हैं, यह श्रुतियों का कथन केसे युक्तिपूर्ण लो सकेगा, इस प…
- Verse 7इस प्रवाद को (अथ रथान् रथयोगान् इत्यादि शति में स्वप्नद्रष्टा में रथादि छृष्टिकठता के प…
- Verse 8जैसे स्वप्न में जगत्चितिरूप काँच का प्रकाश ही है, वैसे ही जाग्रत अवस्था में भी विचित्र ज…
- Verse 9ऐसा मानने पर जाग्रत् और स्वप्न में क्या भेद रहा, इस पर कहते हैं / सबसे पहले प्रवृत्त हुए…
- Verse 10प्रथम संकल्प ही महाप्रलय तक समस्त पदार्थों के स्वभाव की व्यवस्थापक नियति है । उसीके अनुसा…
- Verse 11ऐसी स्थिति में जैसे तरंगों की सत्ता जल सत्ता से भिन्न दूसरी नहीं है, वैसे ही जयत् की सत्…
- Verse 12इस तरह जगत् की अलग सत्ता न होने के कारण जन्म-मरण की भीति आ ही नहीं सकती, किन्तु दोनों प्…
- Verse 13मर जानेवाले व्यक्ति को कुकर्मजनित नरकप्राप्ति की संभावना से भय कर्यो नहीं होगा 2 इस आशंका…
- Verse 14भले ही मरण हो या भले ही जीवन हो इन दोनों की जो वासनाएँ हैं यानी उनकी सूक्ष्मरूप से विद्यम…
- Verse 15जितने प्रकार के भिन्न-भिन्न ज्ञान होते हे, उनका अस्त हो जाने पर पुरुष को जो एकरूप ज्ञान उ…
- Verse 16इस तरह पुरुष को जब यह ज्ञान हो जाता है कि विषयों की सत्ता त्रिकाल में है ही नहीं, तब उसकी…
- Verse 17जो स्वयं चेत्यरूप (विषयरूप) नहीं है, जो चितिक्रियारूप नहीं है, जो चितिक्रिया से प्रकाशित…
- Verse 18अतिस्वच्छ चिदाकाश में जो चिति का निरन्तर प्रकाशन होता है, वही तो जगत्-शब्द से कहा जाता ह…
- Verse 19भद्र, संकल्प के स्वरूप से बना हुआ यह जगत् केवल चिदाकाश का स्पन्दनस्वरूप ही है, अतः वह त्…
- Verse 20है
- Verse 21इस प्रकार परमार्थघनरूप केवल ब्रह्म ही इस जगत् के रूप में भासता है, ब्रह्म न शून्यरूप है…
- Verse 22स्वप्ननगर के सदृश साकार होता हुआ भी ब्रह्मचैतन्य वास्तव में निराकार है, निराकार होता हुआ…
- Verse 23हे श्रीरामजी, चिदाकाश के अन्दर जगदात्मक जो कलुषित स्वरूप है, वह कहे गये मार्ग से अकलुषित…