Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यदा सर्वमनुत्पन्नं नास्त्येवापि च दृश्यते ।
तदा ब्रह्मैव विद्धीदं समं शान्तमसत्समम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव अनुत्यन्न अन्य वस्तु के स्वभाव का साक्षात्कार हो जाने पर उती के रूप में स्थिति
होती ह. यह कहते हैं ।
जब यह सब अनुत्पन्न ही है, है ही नहीं और दिखाई भी देता है, तब इसे आप शान्त, एकरूप
ब्रह्म ही समझिए, जो अज्ञानदशा में असत्-सा है