Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
मरणं जीवितं वास्तु सहजे वासने तयोः ।
इति विश्रान्तचित्तोयः सोऽन्तःशीतल उच्यते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भले ही मरण हो या भले ही जीवन हो
इन दोनों की जो वासनाएँ हैं यानी उनकी सूक्ष्मरूप से विद्यमान जो सत्ता है, वह ब्रह्मसुखरूप ही
है, अतः वे भी ब्रह्मसुखरूप ही है, इसलिए ब्रह्मसुख में विश्रान्ति पानेवाले जो धीर वीर है, वह
अन्दर से शीतलात्मा है, यह कहा जाता है