Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
सर्वसंवित्तिविगमे संविद्रोहति यादृशी ।
भूयते तन्मयेनैव तेनासौ मुक्त उच्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जितने प्रकार के भिन्न-भिन्न ज्ञान होते हे,
उनका अस्त हो जाने पर पुरुष को जो एकरूप ज्ञान उत्पन्न होता है, तद्रूप ही वह बन जाता है,
इससे दृश्य पदार्थो की पृथक् सत्ता का विनाश हो जाता है और पुरुष मुक्त कहा जाता है