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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

अत्यन्ताभावसंवित्त्या सर्वदृश्यस्य वेदनम् । उदेत्यपास्तसंवेद्यं सति वाऽसति सर्गके ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह पुरुष को जब यह ज्ञान हो जाता है कि विषयों की सत्ता त्रिकाल में है ही नहीं, तब उसकी दृष्टि में ब्रह्मरूप से सृष्टि की पारमार्थिक सत्ता ओर स्वतःअसत्ता बन जाती है । उस समय सब दृश्य का ज्ञान निर्विषयक ही उदित होता है, इसलिए ऐसे पुरुष में मुक्तरूपता भलीभाँति आ जाती है