Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यन्न चेत्यं न चिद्रूपं यच्चितेरप्यचेतितम् ।
तद्भावैक्यं गतास्तज्ज्ञाः शान्ता व्यवहृतौ स्थिताः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो स्वयं चेत्यरूप (विषयरूप) नहीं है, जो चितिक्रियारूप नहीं
है, जो चितिक्रिया से प्रकाशित भी नहीं होता, ऐसे ब्रह्मरूपता के साथ एकरूप बन गये
तत्त्वज्ञानी पुरुष परमशान्ति से युक्त होकर व्यवहार में विद्यमान रहते हैं