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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । भावाभावग्रहोत्सर्गस्थूलसूक्ष्मचराचराः । आदावेव हि नोत्पन्नाः सर्गादौ कारणं विना ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एवोक्त शक्तियों से जगद्‌ ब्रह्म से जब अत्यन्त अभिन्न है, तब फलित यह हुआ कि उसकी की उत्पति हुई ही नहीं; यह कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, उत्पत्ति, विनाश, ग्रहण, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर, अचर आदि से युक्त ये जगत्‌ सृष्टि के आदि में पहले ही उत्पन्न नहीं हुए हैं, क्योंकि इनको पैदा करनेवाला कोई कारण उस समय रहता ही नहीं

सर्ग सन्दर्भ

चौवनवाँ सर्ग समाप्त ~ पचपनवाँ सर्ग अन्य की भावना से अपने को अन्यरूप देखती हुई जगत्‌ के रूप में स्थित चिति स्वभावना से तो अनन्यरूप ही है, अतः जगत्‌ वास्तव मे परमार्थमय है, यह वर्णन।