Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 53
बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग अपनी-अपनी अलग-अलग भिन्नता को लिये हुए ये जो आत्मा में आरोपित विषय है, इस सत्ता यानी त्व, तल् आदि प्रत्ययों का अर्थ साक्षात् ब्रह्मरूप ही है - यह वर्णन।
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- Verses 1–4अभी तक यह क्रम बतलाया कि ब्रह्म ही आरोपित अनिर्ववनीय जगत् रूप में विवर्तित होता है, अब इ…
- Verse 5आपने जिन वस्तुओ का भाव (सत्व) पूछा है, वह विदात्मा ही है, क्योकि वही अपने में अध्यस्त पदा…
- Verse 6सबका विनाश हो जाने पर जो वस्तु अन्त में बच जाती है, वही सव वस्तुओं की भावरूप सत्ता है, क्…
- Verse 7वह वस्तु भी अपने कारण में लीन हो जायेगी, इससे वह भी तो असत् ही ठहरेगी, इस पर कहते हैं /…
- Verse 8अतः जिसमें आकाश भी स्थूल पत्थर के सदृश है ओर जो केवल, शान्त, निर्मल आदि अन्त से शून्य है,…
- Verse 9वह जब चेतन शरीररूप से भासने लग जाता है, तब उसकी चारों ओर सत्ता होने के कारण “नहीं है” ऐसा…
- Verse 10ऐसे निर्विषय चित्-स्वभाव की अत्यन्त अग्रश्निद्धि है, इस शका का अनुभव से निवारण करते हैं।…
- Verses 11–12आधी रात तक याढ़ी नींद से मन की निद्राकरालिमा दूर हो जाती है, इस कालिमा के निकल जाने पर सम…
- Verse 13श्रीरामजी, तृण, गुल्म, अंकुर, वृक्ष आदि की उत्पत्ति होने पर साथ-साथ प्रकट हुआ जो एकरूप से…
- Verses 14–15उसी सत्ता-सामान्य के स्वरूप में तादात्म्यरूप से मिला हुआ तथा दूसरे से भिन्न-सा जो घट, पट…
- Verse 16जो कारण से शून्य है यानी जिसके कारण की सत्ता ही नहीं है, उस वस्तु की सत्ता यहाँ कैसे युक्…
- Verse 17तब यह मानिये कि जगत् का शून्य ही कारण है 2 इस पर कहते हैं / हे राघव, शून्य तो अनादि और अ…
- Verse 18इसलिए ब्रह्म मेँ जो जगत्-रूप भासित हो रहा है, वह ब्रह्मरूप ही है, दूसरा नहीं । ऐसी स्थित…
- Verse 19इस तरह यद्यपि असल में जगत् चिद्-ब्रह्मरूप ही है, तथापि जो घट,पट आदि आकार आपाततः (ऊपर-ऊप…
- Verse 20श्रान्ति से जीव ओर जगत् के रूप में ब्रह्म ही हैं और शान्ति क्रा विनाश हो जाने पर वास्तव…
- Verse 21श्रीरामभद्र, भावप्रत्ययों का अर्थ यानी त्व, तल् आदि का अर्थ वही है, जो निर्वाण शब्द से क…