Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तस्मात्तत्र जगद्रूपं यदा भातं तदेव तत् ।
स्वयमेव तदा भाति चिदाकाशमिति स्थितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए ब्रह्म मेँ जो जगत्-रूप भासित हो रहा है, वह ब्रह्मरूप ही है, दूसरा
नहीं । ऐसी स्थिति में त्व, तल् आदि प्रत्ययो के अर्थ के रूप में भी जो स्वरूप भासता है,
स्वयं वह चिदाकाशरूप ब्रह्म ही स्थित है