Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
तस्मिन्पदे जगद्रूपं यदिदं दृश्यते स्फुटम् ।
सकारणमिवाकारकरालमिव भेदवत् ॥ १४ ॥
तत्सर्वं कारणाभावान्न जातं न च विद्यते ।
नाकारयुक्तं न जगन्न च द्वैतैक्यसंयुतम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी सत्ता-सामान्य के स्वरूप में तादात्म्यरूप से
मिला हुआ तथा दूसरे से भिन्न-सा जो घट, पट आदि जगत् का स्पष्ट रूप दीखता है, वह
आगन्तुक होने से सकारण सा तथा कम्बुग्रीव आदि विचित्र आकृतियों से कराल-सा भासता
है, परन्तु है वह सब अनृत यानी मिथ्या ही । इसीलिए वह सब कारण के अभाव से न तो
उत्पन्न हुआ है और न अपना अस्तित्व ही रखता है, इससे यह सिद्ध हुआ कि वह पद न
तो आकारयुक्त है, न जगत्-रूप है और न द्वैत एवं एेक्य से मिला हुआ ही है