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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

सर्गस्य कारणं तत्र न किंचिदुपपद्यते । मलमाकारबीजादि मायामोहभ्रमादिकम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

वह वस्तु भी अपने कारण में लीन हो जायेगी, इससे वह भी तो असत्‌ ही ठहरेगी, इस पर कहते हैं / सत्‌ ही जिसका स्वरूप है, ऐसे शान्त महाचिद्घन वस्तु की उत्पत्ति का कोई कभी कारण युक्ति से सिद्ध नहीं हो सकता, क्योकि मल, आकार, बीज आदि तथा माया,मोह, भ्रम आदि सबकी सिद्धि उसी के अधीन है