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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तदनन्तं महाकाशं महाचिद्घनमुच्यते । अवेद्यचिद्रूपमयं शान्तमेकं समस्थिति ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

आपने जिन वस्तुओ का भाव (सत्व) पूछा है, वह विदात्मा ही है, क्योकि वही अपने में अध्यस्त पदार्थों में अन्योन्य तादात्म्यअध्याय्त होने फर तत्‌-तत्‌ भावरूप बन जाता हैं, यों उत्तर देने की अभिलाषाकर उन भावों की नित्यसद्रफता बतलाने के लिए कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्री रामचन्द्रजी, जो चीज आपने पूछी है, वह चीज तो अनन्त, महाकाश, महाचेतनघन, अवेद्य चिद्रूपमय, शान्त, अद्वितीय और एकरूप से स्थित रहनेवाली ब्रह्म ही है, यही मुनि लोग कहते हैं