Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
न च शून्यमनाद्यन्तं जगतः कारणं भवेत् ।
ब्रह्मामूर्तं समूर्तस्य दृश्यस्याब्रह्मरूपिणः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब यह मानिये कि जगत् का शून्य ही कारण है 2 इस पर कहते हैं /
हे राघव, शून्य तो अनादि और अनन्त है, वह जगत् का कारण नहीं हो सकेगा, क्योकि
जो आदि और अन्त से रहित होता है, वह सब तरह की अल्पता से निर्मुक्त ही रहता है,
इस स्थिति में सभी सब जगह सभी समय में रहने लग जायेंगे । ब्रह्म तो अमूर्तं है यानी आकार
से शून्य है, अतः ब्रह्मस्वभाव से भिन्न साकार जगत् का वह ब्रह्म भी कारण नहीं हो
सकता