Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verses 1–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
यथा चेत्ये चेतनता यथा काले च कालता ।
यथा च व्योमता व्योम्नि यथा च जडता जडे ॥ १ ॥
यथा वायौ च वायुत्वमभूतादावभूतता ।
यथा स्पन्दात्मनि स्पन्दो यथा मूर्ते च मूर्तता ॥ २ ॥
यथा भिन्ने च भिन्नत्वं यथाऽनन्ते ह्यनन्तता ।
यथा दृश्ये च दृश्यत्वं यथा सर्गेषु सर्गता ॥ ३ ॥
एतत्क्रमेण हे ब्रह्मन् वद मे वदतां वर ।
आदितः प्रतिपाद्यैव बोध्यन्ते ह्यल्पबोधिनः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अभी तक यह क्रम बतलाया कि ब्रह्म ही आरोपित अनिर्ववनीय जगत् रूप में विवर्तित
होता है, अब इस विक्य में रामजी यह जानना वाहते हैं कि त्व्. तल् आदि ग्रत्ययों से बोधित
होनेवाली पएथकृ-फथकृ जो घटत्व, मनुष्य आदि जातियाँ हैं; उनका तात्विक स्वरूप क्या हैं,
इसलिए यह प्रश्न करते हैं /
श्रीरामजी ने कहा : गुरुवर, जैसे स्मरण के योग्य विषयों में स्मरण की विषयता जैसे काल में
कालता, जैसे आकाश में आकाशता, जैसे जड़ में जड़ता, जैसे वायु में वायुता, जैसे वर्तमान में या
भविष्यत् में वर्तमानता या भविष्यत्ता, जैसे स्पन्दात्मा में स्पन्दात्मता (स्पन्द), जैसे मूर्त में मूर्तता,
जैसे भिन्न में भिन्नता, जैसे अनन्त में अनन्तता, जैसे दृश्य में दृश्यता और जैसे सर्ग में सर्गता
असाधरण धर्म है, ऐसे ही सब वस्तुओं में भावरूप धर्म हैं अतः इनका परज्ञान करने के लिए जो
बोधक उपाय हों, उनको क्रमशः मुझसे कहिए, क्योकि हे उपदेश देनेवालों में भ्रष्ठ ब्राह्यन्, जो
अल्पज्ञ शिष्य हैं, उनको आरम्भ से ही प्रतिपादनकर समझाना चाहिए
सर्ग सन्दर्भ
बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग अपनी-अपनी अलग-अलग भिन्नता को लिये हुए ये जो आत्मा में आरोपित विषय है, इस सत्ता यानी त्व, तल् आदि प्रत्ययों का अर्थ साक्षात् ब्रह्मरूप ही है - यह वर्णन।