Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 50
उनचासवाँ सर्ग समाप्त पचासवाँ सर्ग वासना की दृढता ओर शिथिलता के कारण जीव सात प्रकार के हो जाते हैं, यह बोधार्थ वर्णन।
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- Verses 1–3वासना यदि न रहे तो सब जीव एक ही है" इस उक्ति से अन्त में जो एकमात्र विचित्रवासना के प्रभा…
- Verse 4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, जैसे क्षीरसागर आदि सात समुद्रों में क्षीर आदि के रस स…
- Verse 5पहले जीवट की आख्यायिका गे प्रदर्शित रीति को लेकर उनका लक्षण कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने…
- Verse 6गाढ़ी नींद में सोये हुए उन जीवों में जो जीव स्वप्न देखते हैं, उन्ीका स्वप्न यह जगत है, यह…
- Verse 7कहीं पर सोये हुए उन जीवों को जो स्वप्न हुआ है, वही जब समान -कर्म-वासना के कारण हम लोगों क…
- Verse 8दीर्घकाल के प्रभाव से जब उनका स्वप्न जाग्रत्-रूप बन जाता है, तब उनके स्वप्न के वे जीव स्…
- Verse 9उनके हम स्वप्ननर हैं? यह जो बात कही गरु इसका उपपादन करते हैं / हमारा देहादि प्रपंच यदि वा…
- Verse 10महाराज, ठीक है, देश को लेकर सव वस्तुओ की सर्वत्र स्थिति भले ही हो जाय, पर काल को लेकर नही…
- Verse 11यदि वे जीव ग्रपंचात्मक स्वप्न में दैवव्श तत्वज्ञान प्राप्त कर लें; तो वे मुक्त हो ही जाये…
- Verse 12उसी प्रकार का कल्पित दूसरा जगत्-कल्प देखते हैं, क्योंकि कल्पनाभासरूपी आकाश की कहीं निरवक…
- Verses 13–14स्वप्नजाग्रत जीवो का उपहार करते हुए अब स्रंकल्पजाग्रतों का निरूपण करते हैं। भद्र, यह तो म…
- Verse 15जीवट आख्यान में वर्णित भिक्षु के समान ये जीव ध्यान से विचलित होकर स्थित हैँ । मनोराज्य के…
- Verse 16जिन जीवों का जाग्रतअभिमान दीर्घकाल के अभ्यास से घनीभूत संकल्प में है और जिनकी संकल्पजनित…
- Verse 17वे संकल्प का विनाश हो जाने पर फिर पूर्व के व्यवहार को उससे विलक्षण बनाकर करने लग जाते हैं…
- Verse 18भद्र, संकल्प के ऊपर निर्भर रहनेवाले ये संकल्पजाग्रत जीव हमने आपसे कहे । ये दृश्यमान जीव उ…
- Verse 19सृष्टि का संकल्प करने के कारण हलचल से युक्त हुए, आगे कहे जानेवाले ब्रह्मा के रूप से वे जी…
- Verse 20फिर ये जीव जब उत्तरोत्तर जन्म परम्परा लेते- जाते हैं ओर जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति में…
- Verse 21पाँचवें प्रकार के जीवों को कहते हैं । पापरूप दुष्कर्मों के आवेश से जड़-स्थावररूप होकर तथा…
- Verse 22अब अवशिष्ट जो दो प्रकार हैं, वे दोनों ही जीवन्मुक्तो में है, यह बतलाने की इच्छा रख रहे मह…
- Verse 23सातवीं भ्रूमिका में आरुढ़ हुए पुरुष ही सातवे प्रकार के जीव हैं; यह कहते हैं / जिन महापुरु…
- Verse 24भद्र, समुद्रों की तरह सात प्रकार के जीवों का भेद मैंने आप से कहा आप इनका भलीभाँति परिज्ञा…
- Verse 25हे श्रीरामजी, आप भ्रम छोड़ दीजिए, यही भ्रम जगत् का द्वैतादिवस्तुबुद्धि से ज्ञान कराता है…