Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
त एव दुष्कृतावेशाज्जडस्थावरतां गताः ।
घनजाग्रत्तया प्रोक्ता जाग्रत्सु घनतां गताः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
पाँचवें प्रकार के जीवों को कहते हैं ।
पापरूप दुष्कर्मों के आवेश से जड़-स्थावररूप होकर तथा जाग्रत् अवस्थाओं में भी घन
अज्ञान से पूर्ण होकर वे चिरजाग्रत जीव ही घन जाग्रत् कहे जाते है । भाव यह है कि स्थावर जीवों
को भी स्वप्न आदि में मनुष्यभाव आदि का अपने में परिज्ञान होता है