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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

भ्रान्तिं परित्यज जगद्गणनात्मिकां त्वं बोधैकरूपघनतामलमागतोऽसि । शून्यत्ववर्जितमशून्यतया च मुक्तं तेन द्वयैक्यकविमुक्तवपुस्त्वमाद्यम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, आप भ्रम छोड़ दीजिए, यही भ्रम जगत्‌ का द्वैतादिवस्तुबुद्धि से ज्ञान कराता है, क्योंकि अब आप ज्ञानरूप आत्मभाव से एकरस बन गये है, द्वैत ओर एेक्य से मुक्त शरीर होकर आप शून्यत्व और अशून्यत्व धर्म से रहित हो गये हैं तथा सब कल्पनाओं के पूर्ववर्ती अधिष्ठानभूत हो गये हैं