Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
येषु कल्पेषु ते जाताः क्षीयन्ते कल्पकल्पनाः ।
यदि तास्तत्कथं तेषां प्रबुद्धानामवस्थितिः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, ठीक है, देश को लेकर सव वस्तुओ की सर्वत्र स्थिति भले ही हो जाय, पर काल को
लेकर नहीं हो सकती, क्योकि भ्रुतकाल की वस्तु वर्तमानकाल में कैसे रह सकती है, यदि भिन्न-
भिन्नकाल की वस्तुओ की स्थिति एक काल में मानी जाय, तो सब कल्य एक साथ ही होने लय
जायेंगे और उनका पार्थक्य भी नहीं रह जायेगा, इस आशय से श्रीरामजी प्रश्न करते हैं /
श्रीरामभद्र ने कहा : गुरुवर, जिन कल्पो में हम लोगों के प्रपंचों से स्वप्नों के द्रष्टा उन
जीवों ने जन्म धारण किया था, उन कल्पो की कल्पनाएँ यदि उनके शरीरों के साथ इस समय
नष्ट हो चुकीं, तो इस वर्तमान स्वप्न से जागे हुए उन लोगों की भूतकाल के कल्प में स्थिति
नहीं हो सकती । जो आज नींद से जागा है, वह पूर्व दिन का जागरण जब नहीं जान सकता,
तब पूर्वकल्प की तो बात ही क्या ?