Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
ये तु शास्त्रार्थसत्सङ्गबोधिता बोधमागताः ।
पश्यन्ति स्वप्नवज्जाग्रज्जाग्रत्स्वप्ना भवन्ति ते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब अवशिष्ट जो दो प्रकार हैं, वे दोनों ही जीवन्मुक्तो में है, यह बतलाने की इच्छा रख रहे
महाराज वस्िष्ठजी, छठे प्रकार के जीवों का उल्लेख करते हैं /
चतुर्थ, पंचम और छठी भूमिका में अवस्थित जो जीव हैं, वे शास्त्रार्थ एवं सत्संग के द्वारा
उपदेश ग्रहणकर तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके जाग्रत् को स्वप्न के सदृश देखते हैं, वे जाग्रत्स्वप्न
कहलाते हे