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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इह स्वप्नभ्रमान्ते ते मुच्यन्ते वा विनिद्रताम् । प्राप्य संकल्पतो देहांस्तथैवान्यान्श्रयन्त्यलम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि वे जीव ग्रपंचात्मक स्वप्न में दैवव्श तत्वज्ञान प्राप्त कर लें; तो वे मुक्त हो ही जायेगे, ऐसी स्थिति में आपका दोष नहीं हो सकता / यदि उन्होंने तत्वज्ञान प्राप्त नहीं किया, तो उनका अवशिष्ट कल्य तो व्यतीत हुआ नहीं है, इसलिए कुछ समय के काद तत्वज्ञान हो ही जायेया / जो व्यतीत हो बुके हैं; वे तो दूसरे की कल्पना से कल्पित पदार्थ हैं / उनके मन में तो प्रत्येक का कल्पशेष एन्दव आख्यान की पद्धति से विद्यमान ही है, इस आशय से महाराज वस्तिष्ठजी समाधान करते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इसी स्वप्न के प्रपंच में यदि ज्ञान हुआ तो वे तत्त्वज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो जाते हे । यदि न हुआ, तो निद्रा प्राप्त कर वे संकल्पानुसार उसी प्रकार की दूसरी ही देह प्राप्त करते हैं